वैश्विक संकट - अल-नीनो और भारत की चुनौतियाँ

Jitendra Kumar Sinha
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मानव सभ्यता आज ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ विज्ञान, तकनीक और आर्थिक प्रगति के अभूतपूर्व युग के बावजूद असुरक्षाएँ कम होने के बजाय बढ़ती दिखाई दे रही है। विश्व राजनीति में तनाव है, अर्थव्यवस्था अस्थिर है, युद्धों की आशंकाएँ बढ़ रही हैं और जलवायु परिवर्तन मानव जीवन के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।


एक समय था जब देशों की शक्ति का आकलन केवल उनकी सैन्य क्षमता और आर्थिक संसाधनों से किया जाता था, लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल चुकी है। अब किसी राष्ट्र की वास्तविक ताकत इस बात से आँकी जाती है कि वह संकट के समय स्वयं को कितना संभाल पाता है। महामारी, युद्ध, आर्थिक मंदी और प्राकृतिक आपदाएँ आज राष्ट्रों की परीक्षा लेने वाले सबसे बड़े कारक बन चुके हैं।


भारत भी इस वैश्विक परिदृश्य से अछूता नहीं है। एक ओर देश विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, तो दूसरी ओर उसे अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक युद्धों का प्रभाव, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, खाद्यान्न सुरक्षा, रोजगार, ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। इसी बीच अल-नीनो का खतरा एक नई चुनौती के रूप में सामने आ रहा है। यदि इसके प्रभाव अपेक्षा से अधिक गंभीर हुए, तो भारत को मानसून की कमी, सूखे, जल संकट और कृषि उत्पादन में गिरावट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।


आज दुनिया कई मोर्चों पर संघर्षों का सामना कर रही है। यूरोप से लेकर मध्य पूर्व तक युद्ध और भू-राजनीतिक टकराव जारी हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष ने वैश्विक खाद्यान्न और ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। इसके कारण गेहूँ, उर्वरक और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है। दूसरी ओर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। तेल की कीमतों में थोड़ी-सी वृद्धि भी भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव डालती है। इसके अलावा अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। तकनीकी वर्चस्व, व्यापारिक प्रतिबंध और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो रही है। इन परिस्थितियों में भारत को अपनी आर्थिक गति बनाए रखने के साथ-साथ खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।


यदि हम पिछले कुछ वर्षों पर नजर डालें तो पाएँगे कि प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं। कहीं अभूतपूर्व बाढ़ आ रही है, तो कहीं वर्षों तक सूखे की स्थिति बनी हुई है। हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण मानवीय गतिविधियाँ हैं। जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, जंगलों की कटाई और औद्योगिक प्रदूषण ने पृथ्वी की जलवायु प्रणाली को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप मौसम के पारंपरिक पैटर्न बदल रहे हैं। मानसून, जो भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा माना जाता है, अब पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित होता जा रहा है।


अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि की स्थिति को कहा जाता है। सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग में गर्म पानी और पूर्वी भाग में अपेक्षाकृत ठंडा पानी रहता है। लेकिन अल-नीनो के दौरान यह संतुलन बिगड़ जाता है और समुद्री तापमान बढ़ जाता है। यह परिवर्तन केवल महासागर तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करता है। भारत के लिए इसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि अल-नीनो अक्सर कमजोर मानसून से जुड़ा होता है। चूँकि भारत की लगभग आधी कृषि वर्षा पर निर्भर है, इसलिए मानसून में थोड़ी-सी कमी भी व्यापक प्रभाव डाल सकती है।


भारतीय मानसून विश्व की सबसे जटिल मौसम प्रणालियों में से एक है। देश के लगभग 60 प्रतिशत कृषि क्षेत्र की सिंचाई मानसून पर निर्भर करती है। इसके अलावा पेयजल, जलाशय, बिजली उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मानसून से जुड़ी हुई है। इतिहास बताता है कि भारत में कई बड़े सूखे वाले वर्ष अल-नीनो से जुड़े रहे हैं। हालाँकि हर अल-नीनो वर्ष में सूखा नहीं पड़ता, लेकिन मानसून कमजोर होने की संभावना बढ़ जाती है। यदि मानसून सामान्य से कम रहता है तो सबसे पहले कृषि क्षेत्र प्रभावित होता है। इसके बाद इसका असर पूरे आर्थिक तंत्र में दिखाई देने लगता है।


भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कमजोर मानसून की स्थिति में किसानों को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। धान, दाल, तिलहन और अन्य खरीफ फसलें वर्षा पर अत्यधिक निर्भर होती हैं। यदि समय पर बारिश नहीं होती या वर्षा की मात्रा कम रहती है, तो उत्पादन घट सकता है। उत्पादन में गिरावट का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है। कम उत्पादन का मतलब है बाजार में कम आपूर्ति, जिससे कीमतें बढ़ने लगती हैं। यही कारण है कि मौसम विशेषज्ञों द्वारा अल-नीनो की चेतावनी को कृषि क्षेत्र गंभीरता से लेता है।


भारत पहले से ही जल संकट का सामना कर रहा है। देश के अनेक हिस्सों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। शहरों में पानी की मांग बढ़ रही है जबकि जल स्रोतों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो जलाशयों में पानी का स्तर कम हो सकता है। इसका असर पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर हो सकती है जहाँ लोग सीधे वर्षा और स्थानीय जल स्रोतों पर निर्भर रहते हैं।


अल-नीनो के प्रभाव से तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना रहती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का अनुभव किया है। अत्यधिक तापमान का प्रभाव केवल स्वास्थ्य पर नहीं पड़ता बल्कि ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ता है। जब तापमान बढ़ता है तो एयर कंडीशनर, कूलर और पंखों का उपयोग बढ़ जाता है। इससे बिजली की मांग में अचानक वृद्धि होती है। यदि बिजली उत्पादन और वितरण प्रणाली पर्याप्त तैयार न हो तो कई क्षेत्रों में बिजली संकट उत्पन्न हो सकता है। इसके अलावा कोयला और गैस की मांग बढ़ने से ऊर्जा लागत भी बढ़ सकती है।


कमजोर मानसून और घटते कृषि उत्पादन का सीधा प्रभाव खाद्यान्न कीमतों पर पड़ता है। जब उत्पादन कम होता है और मांग बनी रहती है तो कीमतें बढ़ना स्वाभाविक है। विशेष रूप से दालें, सब्जियाँ, तेलहन और अनाज महंगे हो सकते हैं। महंगाई का सबसे अधिक असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ता है क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन और आवश्यक वस्तुओं पर खर्च होता है। यदि खाद्यान्न महंगाई लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका प्रभाव आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है।


पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, फसल बीमा, जलाशय निर्माण और मौसम पूर्वानुमान प्रणाली को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा किसानों को मौसम आधारित सलाह देने के लिए डिजिटल तकनीकों का उपयोग भी बढ़ा है। फिर भी चुनौतियाँ इतनी बड़ी हैं कि केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। समाज, उद्योग, किसान और आम नागरिक—सभी को मिलकर जल संरक्षण और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की दिशा में काम करना होगा।


इतिहास गवाह है कि संकट ही किसी राष्ट्र की वास्तविक क्षमता को उजागर करते हैं। युद्ध, महामारी, आर्थिक मंदी और प्राकृतिक आपदाएँ केवल संसाधनों की नहीं बल्कि नेतृत्व, दूरदर्शिता और सामाजिक एकता की भी परीक्षा लेती हैं। आज भारत ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितताएँ और जलवायु परिवर्तन एक साथ चुनौती बनकर सामने खड़े हैं। यदि अल-नीनो का प्रभाव गंभीर हुआ तो यह इन चुनौतियों को और जटिल बना सकता है। लेकिन हर संकट अपने साथ अवसर भी लेकर आता है। जल संरक्षण, टिकाऊ कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में उठाए गए कदम भारत को भविष्य की चुनौतियों के लिए अधिक सक्षम बना सकते हैं। प्रकृति लगातार संकेत दे रही है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में वही समाज और राष्ट्र सफल होंगे जो इन संकेतों को समय रहते समझकर अपने विकास मॉडल को प्रकृति के अनुकूल बनाने का साहस दिखाएँगे।



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