आरोपों के सहारे कब तक चलेगी विपक्ष की राह?

Jitendra Kumar Sinha
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लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की अपनी-अपनी भूमिका होती है। सत्ता पक्ष शासन चलाता है तो विपक्ष उसकी नीतियों की समीक्षा करता है, कमियों को उजागर करता है और जनता के समक्ष वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। लेकिन जब विपक्ष का प्रमुख हथियार केवल आरोप, लांछन और तोहमत बन जाए, तब राजनीति का स्वरूप बदलने लगता है। बहस और विमर्श की जगह कटुता ले लेती है, तथ्यों की जगह धारणाएँ और नीतियों की जगह नारों का शोर सुनाई देने लगता है।


तोहमत अर्थात किसी व्यक्ति, संस्था या विचारधारा पर आरोप लगाना। यह शब्द केवल राजनीतिक शब्दकोष का हिस्सा नहीं है, बल्कि मानव स्वभाव की उस प्रवृत्ति का भी प्रतीक है जिसमें व्यक्ति अपनी असफलताओं का कारण दूसरों में खोजता है। राजनीति में यह प्रवृत्ति और अधिक दिखाई देती है क्योंकि यहाँ सत्ता प्राप्ति का लक्ष्य सर्वोपरि होता है।


आज भारतीय राजनीति ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ आरोप और प्रत्यारोप सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि बार-बार लगाए गए आरोप यदि जनता के अनुभवों से मेल नहीं खाते, तो वे आरोप लगाने वाले पक्ष की विश्वसनीयता को ही कमजोर कर देते हैं।


मानव इतिहास में आरोप हमेशा से संघर्ष का एक माध्यम रहे हैं। किसी को दोषी सिद्ध कर देना स्वयं को सही सिद्ध करने का सबसे आसान तरीका माना गया है। राजनीति में भी यही सिद्धांत लागू होता है। जब किसी दल के पास अपने पक्ष में पर्याप्त उपलब्धियाँ या स्पष्ट वैकल्पिक दृष्टि नहीं होती है, तब वह विरोधी को कटघरे में खड़ा करने की रणनीति अपनाता है।


यह रणनीति कुछ समय तक प्रभावी भी दिखाई देती है। मीडिया का ध्यान आकर्षित होता है, समर्थकों में उत्साह पैदा होता है और विरोधियों के खिलाफ माहौल बनाने का अवसर मिलता है। लेकिन इस रणनीति की एक सीमा होती है। यदि आरोपों के समर्थन में तथ्य न हों या जनता को उनमें राजनीतिक स्वार्थ दिखाई देने लगे, तो वही रणनीति उलटी पड़ जाती है। यही कारण है कि इतिहास में अनेक राजनीतिक आंदोलनों ने केवल विरोध के आधार पर शुरुआत तो की, लेकिन स्थायी सफलता उन्हें तभी मिली जब उन्होंने सकारात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। केवल आरोप किसी आंदोलन को खड़ा कर सकते हैं, लेकिन उसे लंबे समय तक जीवित नहीं रख सकते।


भारतीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का इतिहास नया नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से ही विभिन्न दल एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण, अवसरवाद, परिवारवाद और जनविरोधी नीतियों के आरोप लगाते रहे हैं। समय के साथ आरोपों की भाषा और अधिक आक्रामक होती गई। सोशल मीडिया के विस्तार ने इस प्रवृत्ति को और गति दी। अब कोई भी आरोप कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। इसके कारण राजनीतिक संवाद अधिक तीखा और ध्रुवीकृत हुआ है। दुर्भाग्य से इस प्रक्रिया में तथ्यों की जगह भावनाएँ अधिक प्रभावी होने लगी हैं। किसी आरोप का सत्यापन होने से पहले ही वह राजनीतिक हथियार बन जाता है। इससे लोकतांत्रिक विमर्श प्रभावित होता है और समाज में अविश्वास का वातावरण पैदा होता है।


पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में "गोदी मीडिया" शब्द अत्यंत लोकप्रिय हुआ। विपक्षी दलों और उनके समर्थकों ने इस शब्द का उपयोग उन मीडिया संस्थानों के लिए किया जिन्हें वे सरकार समर्थक मानते थे। मीडिया की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है। मीडिया यदि निष्पक्ष न रहे तो उस पर प्रश्न उठाना आवश्यक है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब आलोचना और आरोप के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।


यदि किसी पत्रकार या चैनल का दृष्टिकोण पसंद न आए और उसे सीधे "गोदी मीडिया" घोषित कर दिया जाए, तो यह संवाद का नहीं बल्कि लेबल लगाने का प्रयास बन जाता है। धीरे-धीरे यह स्थिति ऐसी बन गई कि केवल मीडिया संस्थान ही नहीं, बल्कि उनसे सहमत दर्शक भी आलोचना के दायरे में आने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि समाज में वैचारिक विभाजन और गहरा हुआ। लोग विचारों पर चर्चा करने के बजाय एक-दूसरे की निष्ठा पर प्रश्न उठाने लगे।


राजनीतिक दल अक्सर अपने समर्थकों को संगठित करने के लिए विरोधी की पहचान गढ़ते हैं। यह रणनीति नई नहीं है। लेकिन जब पूरा राजनीतिक विमर्श "हम" और "वे" की रेखा पर खड़ा हो जाए, तब लोकतंत्र की आत्मा को क्षति पहुँचती है।


भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में यह खतरा और अधिक बढ़ जाता है। यहाँ अलग-अलग धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और सामाजिक समूह हैं। यदि राजनीति इन विविधताओं को जोड़ने के बजाय विभाजन का माध्यम बन जाए तो सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। पिछले वर्षों में कई राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति ऐसे ही विभाजनों पर आधारित की है। लेकिन चुनावी परिणामों ने बार-बार यह संकेत दिया है कि भारतीय मतदाता अंततः स्थिरता, विकास और शासन की गुणवत्ता को भी महत्व देता है।


भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में अभूतपूर्व राजनीतिक विस्तार किया है। देश के अनेक राज्यों में उसने अपनी उपस्थिति मजबूत की है और राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख शक्ति के रूप में उभरी है। इसके पीछे कई कारण हैं। मजबूत संगठन, स्पष्ट नेतृत्व, राष्ट्रवाद का विमर्श, कल्याणकारी योजनाओं का प्रचार और बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं।


विपक्ष ने अक्सर भाजपा की सफलता को केवल प्रचार, मीडिया समर्थन या ध्रुवीकरण से जोड़ने का प्रयास किया है। लेकिन यदि किसी दल की सफलता को केवल आरोपों के माध्यम से समझा जाए तो वास्तविक कारणों का विश्लेषण नहीं हो पाता है। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में सफलता के लिए विरोधी की आलोचना पर्याप्त नहीं होती है। उसके प्रभाव के कारणों को समझना और बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना भी आवश्यक होता है।


अक्सर यह प्रश्न उठाया जाता है कि कुछ समुदायों की भागीदारी भाजपा में अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई देती है। यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न है और इस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन इसका उत्तर केवल आरोपों में नहीं खोजा जा सकता है। राजनीतिक विश्वास का निर्माण लंबे समय में होता है। इसमें ऐतिहासिक अनुभव, सामाजिक संपर्क, संगठनात्मक प्रयास और नेतृत्व की भूमिका सभी शामिल होती हैं। यदि कोई वर्ग किसी दल से दूरी बनाए रखता है तो दोनों पक्षों को आत्ममंथन करना चाहिए। केवल एक-दूसरे पर दोषारोपण करने से समाधान नहीं निकलता। लोकतंत्र संवाद से मजबूत होता है, आरोपों से नहीं।


विभिन्न विपक्षी दलों द्वारा गठित इंडी गठबंधन का उद्देश्य भाजपा के विरुद्ध एक साझा मंच तैयार करना था। इस गठबंधन ने लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। लेकिन गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि उसका साझा एजेंडा क्या है। भाजपा विरोध के अतिरिक्त जनता के सामने कौन-सी स्पष्ट नीति और कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाएँगे, यह प्रश्न लगातार बना रहा।


हालिया बैठकों में गठबंधन के नेताओं ने एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की है। लेकिन केवल राजनीतिक संदेश पर्याप्त नहीं होते। जनता ठोस योजनाएँ, आर्थिक दृष्टि, रोजगार के अवसर और प्रशासनिक क्षमता भी देखना चाहती है। यदि विपक्ष अपनी ऊर्जा केवल आरोपों में खर्च करेगा तो वह जनता के उन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाएगा जो उसके दैनिक जीवन से जुड़े हैं।


राजनीति में सबसे बड़ा संकट पराजय नहीं, बल्कि प्रासंगिकता का खो जाना है। कोई दल चुनाव हारकर भी मजबूत रह सकता है, लेकिन यदि जनता उसे गंभीरता से लेना बंद कर दे तो उसकी स्थिति कठिन हो जाती है। लगातार आरोप लगाने की राजनीति अक्सर इसी दिशा में ले जाती है। जब जनता को लगता है कि कोई दल केवल विरोध के लिए विरोध कर रहा है, तब उसके प्रति रुचि कम होने लगती है। यही उपेक्षा की पहली सीढ़ी है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि मतदाता केवल नारों से प्रभावित नहीं होता। वह परिणाम, नीतियाँ और नेतृत्व की विश्वसनीयता भी देखता है।


लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सकारात्मकता में निहित है। विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की आलोचना करना नहीं है, बल्कि बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना भी है। यदि विपक्ष शिक्षा सुधार, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, रोजगार सृजन, कृषि सुधार और आर्थिक विकास पर ठोस दृष्टि प्रस्तुत करे तो लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा और मजबूत होगी। इसी प्रकार सत्ता पक्ष को भी आलोचना को शत्रुता के रूप में नहीं देखना चाहिए। स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहाँ आलोचना और उत्तरदायित्व दोनों मौजूद हो।


राजनीतिक इतिहास का अनुभव स्पष्ट है कि तोहमत की राजनीति अंततः सीमित परिणाम देती है। आरोपों के आधार पर माहौल बनाया जा सकता है, लेकिन स्थायी जनसमर्थन नहीं प्राप्त किया जा सकता। जनता अंततः कार्य, परिणाम और नेतृत्व की विश्वसनीयता को महत्व देती है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन के लिए आवश्यक है कि वह आरोपों से आगे बढ़कर विश्वास की राजनीति करे। किसी व्यक्ति, संस्था या विचारधारा को लगातार दोषी ठहराकर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की कोशिश अल्पकालिक लाभ दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में वही रणनीति उपेक्षा का कारण बन जाती है।


लोकतंत्र में विजय का मार्ग आरोपों से नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास, नीति और जनसेवा से होकर गुजरता है। यही वह सत्य है जिसे समझने वाले दल समय के साथ मजबूत होते हैं और जिसे भूलने वाले धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिए पर चले जाते हैं और इसलिए यह स्मरण रखना आवश्यक है कि तोहमत की आँधी में उड़ाकर किसी को अपने पक्ष में करने की अपेक्षा ही उपेक्षित होने की पहली सीढ़ी होती है। राजनीति का भविष्य आरोपों में नहीं, विश्वास में छिपा है।



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