प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर बदलती विश्व व्यवस्था तक

Jitendra Kumar Sinha
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भारत का लोकतंत्र अनेक उतार-चढ़ाव, संघर्षों और उपलब्धियों का साक्षी रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से देश ने अनेक प्रधानमंत्रियों को देखा, जिनमें प्रत्येक ने अपने समय की चुनौतियों और अवसरों के अनुसार राष्ट्र की दिशा तय करने का प्रयास किया। किंतु कुछ अवसर ऐसे होते हैं जो केवल राजनीतिक घटनाएं नहीं रह जाते, बल्कि इतिहास के पन्नों पर स्थायी रूप से दर्ज हो जाते हैं। ऐसा ही एक अवसर तब आया जब श्री नरेन्द्र मोदी निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने रहने वाले स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्ति बन गए।


यह केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की निरंतरता, जनादेश की शक्ति और बदलते राजनीतिक विमर्श का भी प्रतीक है। इस उपलब्धि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह ऐसे दौर में हासिल हुई है जब विश्व राजनीति पहले से कहीं अधिक अस्थिर, अनिश्चित और तेजी से परिवर्तित हो रही है।


जब पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में लंबे समय तक सत्ता में रहे, तब आज की अधिकांश पीढ़ियां अस्तित्व में नहीं थी। हमने उनके शासनकाल को इतिहास की पुस्तकों, दस्तावेजों और वरिष्ठ लोगों के संस्मरणों के माध्यम से जाना है। लेकिन नरेन्द्र मोदी के इस कीर्तिमान के हम प्रत्यक्ष साक्षी हैं। यही इतिहास और वर्तमान के बीच का सबसे बड़ा अंतर है। इतिहास को पढ़ा जाता है, जबकि वर्तमान को जिया जाता है। जब कोई रिकॉर्ड बनता है तो वह केवल आंकड़ा नहीं होता है, बल्कि उस समय की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का भी प्रतिबिंब होता है।


नरेन्द्र मोदी भारतीय राजनीति में स्थायित्व और जनसमर्थन की उस शक्ति को दर्शाता है जिसने लगातार तीन आम चुनावों में उन्हें जनता का विश्वास दिलाया। चाहे कोई उनके समर्थक हो या आलोचक, यह स्वीकार करना होगा कि इतनी लंबी अवधि तक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनादेश बनाए रखना सामान्य उपलब्धि नहीं है।


लोकतंत्र में कीर्तिमान केवल सत्ता में बने रहने से नहीं बनता। यह जनता के भरोसे, राजनीतिक संगठन की क्षमता, नेतृत्व कौशल और समय की परिस्थितियों के सम्मिलित परिणाम से निर्मित होता है। किसी तानाशाही व्यवस्था में लंबे समय तक शासन करना संभव हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में हर कुछ वर्षों पर जनता के सामने परीक्षा देनी पड़ती है। जनता संतुष्ट हो तो समर्थन देती है और असंतुष्ट हो तो सत्ता बदल देती है। इसीलिए लोकतांत्रिक कीर्तिमान विशेष महत्व रखते हैं। वे केवल व्यक्ति की उपलब्धि नहीं होते, बल्कि मतदाताओं के सामूहिक निर्णय का परिणाम होते हैं।


वास्तव में यदि हम पिछले एक दशक को देखें तो पाएंगे कि यह केवल भारत में सत्ता परिवर्तन या नेतृत्व परिवर्तन का दौर नहीं है। पूरी दुनिया एक व्यापक संक्रमण काल से गुजर रही है। तकनीक ने जीवन की परिभाषा बदल दी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव श्रम को चुनौती दे रही है। सोशल मीडिया ने सूचना के प्रवाह को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन भ्रम और दुष्प्रचार के नए संकट भी पैदा किए हैं। आर्थिक शक्ति का केंद्र पश्चिम से पूर्व की ओर खिसक रहा है। चीन, भारत और अन्य एशियाई देशों का प्रभाव बढ़ रहा है। वहीं यूरोप और अमेरिका नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इस परिवर्तनशील समय में राजनीतिक नेतृत्व भी नए स्वरूप में उभर रहा है। पारंपरिक राजनीति की जगह व्यक्तित्व-आधारित राजनीति ने ले ली है। जनता अब दलों से अधिक नेताओं को पहचानती है।


यदि इस युग की सबसे चर्चित राजनीतिक हस्तियों की सूची बनाई जाए तो उसमें डोनाल्ड ट्रंप का नाम निश्चित रूप से शीर्ष पर होगा। ट्रंप केवल अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं है,  वे एक ऐसी राजनीतिक प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने वैश्विक राजनीति के स्थापित मानकों को चुनौती दी है। व्यापार जगत से राजनीति में आए ट्रंप ने उस धारणा को तोड़ दिया कि केवल पारंपरिक राजनेता ही सर्वोच्च पद तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने अमेरिकी राजनीति की भाषा, शैली और प्राथमिकताओं को बदल दिया। उनके समर्थक उन्हें राष्ट्रवादी पुनर्जागरण का प्रतीक मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती के रूप में देखते हैं। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है कि ट्रंप ने राजनीति को पहले जैसा नहीं रहने दिया।


मानव सभ्यता ने दो विश्वयुद्धों की विभीषिका देखी थी। उसके बाद लंबे समय तक यह विश्वास किया गया कि वैश्विक संस्थाएं और कूटनीति बड़े युद्धों को रोकने में सफल रहेगी। लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक में यह विश्वास कमजोर पड़ता दिखाई देता है। यूरोप में युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तनाव और महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा यह संकेत दे रही है कि दुनिया एक बार फिर अस्थिरता की ओर बढ़ रही है। इस पृष्ठभूमि में भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। भारत न केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, बल्कि वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में भी उभर रहा है।


इतिहास का सबसे बड़ा सत्य परिवर्तन है। जो आज शिखर पर है, वह कल नीचे भी आ सकता है। जो आज संघर्ष कर रहा है, वह कल सफलता के नए आयाम स्थापित कर सकता है। रोमन साम्राज्य, ब्रिटिश साम्राज्य, सोवियत संघ, इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां अपार शक्ति रखने वाली व्यवस्थाएं समय के साथ बदल गईं। व्यक्ति भी इसी नियम से बंधे हैं। कोई नेता कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो, समय का पहिया अंततः आगे बढ़ता है। नई पीढ़ियां आती हैं, नए विचार आते हैं और नई परिस्थितियां जन्म लेती हैं। इसीलिए कीर्तिमान महत्वपूर्ण तो होते हैं, लेकिन वे स्थायी नहीं होते।


हमारा वर्तमान कालखंड एक विचित्र विरोधाभास से भरा हुआ है। एक ओर मानव चंद्रमा और मंगल तक पहुंचने की तैयारी कर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता नए चमत्कार कर रही है। विज्ञान और तकनीक अभूतपूर्व ऊंचाइयों को छू रहे हैं। दूसरी ओर आध्यात्मिकता, योग, ध्यान और सांस्कृतिक पहचान की खोज भी बढ़ रही है। लोग आधुनिकता को अपनाना चाहते हैं, लेकिन अपनी जड़ों से भी जुड़े रहना चाहते हैं। यही कारण है कि भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक चेतना दोनों समानांतर रूप से आगे बढ़ रही हैं। भारत इस संतुलन का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभर रहा है।


इतिहास का प्रत्येक रिकॉर्ड अस्थायी होता है। कभी सचिन तेंदुलकर के शतकों का रिकॉर्ड अटूट माना जाता था। कभी कई राजनीतिक नेताओं का प्रभाव स्थायी प्रतीत होता था। लेकिन समय के साथ नए लोग आए और नए कीर्तिमान स्थापित हुए। लेकिन इससे इस उपलब्धि का महत्व कम नहीं होता। हर रिकॉर्ड अपने समय का प्रतिनिधित्व करता है और उस समय की परिस्थितियों को समझने का अवसर देता है।


राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति, इन सभी के ऊपर यदि कोई अंतिम शक्ति है तो वह समय है। समय ही राजा को रंक और रंक को राजा बनाता है। समय ही विचारों को लोकप्रिय और अप्रासंगिक बनाता है। समय ही व्यक्तियों को इतिहास के नायक या खलनायक के रूप में स्थापित करता है। इसलिए किसी भी उपलब्धि का मूल्यांकन करते समय यह समझना चाहिए कि वह केवल व्यक्ति की नहीं, बल्कि समय और परिस्थितियों की भी देन होती है।


नरेन्द्र मोदी का निर्वाचित प्रधानमंत्री बने रहना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह उपलब्धि उनके राजनीतिक कौशल, संगठनात्मक क्षमता और जनसमर्थन का प्रमाण है। साथ ही यह उस व्यापक परिवर्तनशील युग की भी याद दिलाती है। यह ऐसा कालखंड है जहां नए रिकॉर्ड बन रहे हैं, पुराने टूट रहे हैं, विश्व व्यवस्था बदल रही है, तकनीक मानव जीवन को पुनर्परिभाषित कर रही है और राजनीति नए रूप धारण कर रही है।



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