समुद्री लहरों की ऊर्जा से चलेगा तैरता हुआ ‘एआई डेटा सेंटर’

Jitendra Kumar Sinha
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानि एआई का विस्तार जिस तेजी से हो रहा है, उसी तेजी से डेटा सेंटरों की जरूरत भी बढ़ रही है। एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने और संचालित करने के लिए बड़ी संख्या में शक्तिशाली कंप्यूटर चिप्स की आवश्यकता होती है। ये चिप्स भारी मात्रा में बिजली खपत करते हैं और काफी गर्मी भी पैदा करते हैं। ऐसे में भविष्य के डेटा सेंटरों के लिए स्वच्छ ऊर्जा और प्रभावी कूलिंग व्यवस्था बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इसी चुनौती का एक अनोखा समाधान अमेरिका के ओरेगन स्थित स्टार्टअप पैंथलासा तलाश रहा है। कंपनी समुद्र में तैरने वाला ऐसा एआई डेटा सेंटर विकसित कर रही है, जो समुद्री लहरों से ऊर्जा प्राप्त करेगा। इस परियोजना का उद्देश्य एआई कंप्यूटिंग को समुद्र की प्राकृतिक ऊर्जा से जोड़ना है।


पैंथलासा की प्रस्तावित प्रणाली लगभग 85 मीटर लंबी होगी। इसे समुद्र में तैरते हुए एक तरह के विशाल डेटा सेंटर के रूप में देखा जा रहा है। इसमें अत्याधुनिक एआई चिप्स लगाए जाएंगे, जो डेटा प्रोसेसिंग और एआई से जुड़े भारी कंप्यूटिंग कार्यों को संभालेंगे। इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि इसके लिए बिजली उत्पादन और कूलिंग—दोनों के लिए समुद्री वातावरण का इस्तेमाल किया जाएगा। समुद्र की लहरों से टर्बाइन के माध्यम से बिजली पैदा करने की योजना है। वहीं समुद्री पानी का इस्तेमाल एआई चिप्स को ठंडा रखने के लिए किया जाएगा। इस तरह एक ही प्राकृतिक संसाधन ऊर्जा और ताप प्रबंधन, दोनों जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है।


समुद्री लहरों में लगातार गतिज ऊर्जा मौजूद रहती है। यदि इस ऊर्जा को तकनीकी तरीके से टर्बाइन तक पहुंचाया जाए, तो उससे बिजली पैदा की जा सकती है। पैंथलासा इसी सिद्धांत को डेटा सेंटर के लिए इस्तेमाल करने की दिशा में काम कर रहा है। सामान्य डेटा सेंटरों में बिजली की भारी मांग होती है। साथ ही सर्वर और प्रोसेसर से पैदा होने वाली गर्मी को नियंत्रित करने के लिए बड़े पैमाने पर कूलिंग सिस्टम चलाने पड़ते हैं। समुद्र में स्थित डेटा सेंटर के मामले में लहरों से बिजली और समुद्री पानी से कूलिंग उपलब्ध कराने की अवधारणा ऊर्जा दक्षता बढ़ाने की संभावना रखती है।


एआई चिप्स जितनी अधिक क्षमता से काम करती हैं, उतनी ही अधिक गर्मी उत्पन्न करती हैं। पारंपरिक डेटा सेंटरों में इस गर्मी को नियंत्रित करने के लिए एयर कंडीशनिंग और अन्य कूलिंग तकनीकों पर काफी ऊर्जा खर्च होती है। पैंथलासा की प्रणाली में समुद्री पानी को कूलिंग व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाएगा। ठंडे समुद्री पानी की मदद से चिप्स से निकलने वाली गर्मी को नियंत्रित किया जा सकता है। इससे डेटा सेंटर की कुल ऊर्जा जरूरत को कम करने की संभावना बनती है। हालांकि समुद्री पानी के इस्तेमाल से जंग, नमक और उपकरणों की दीर्घकालिक सुरक्षा जैसी तकनीकी चुनौतियां भी सामने आएंगी। इसलिए ऐसी प्रणाली की विश्वसनीयता और रखरखाव महत्वपूर्ण होंगे।


कंपनी का ‘ओशन-2’ प्रोटोटाइप फिलहाल वॉशिंगटन के तट के पास परीक्षणाधीन है। यह चरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समुद्र का वास्तविक वातावरण प्रयोगशाला की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। लहरों की तीव्रता, मौसम, समुद्री जल और नेटवर्क कनेक्टिविटी जैसी परिस्थितियों में सिस्टम की क्षमता का परीक्षण किया जा रहा है। इस प्रोटोटाइप में एआई डेटा को स्पेसएक्स के स्टारलिंक नेटवर्क के जरिए भेजने और प्राप्त करने की व्यवस्था भी की गई है। इसका अर्थ है कि समुद्र में मौजूद कंप्यूटिंग सिस्टम को जमीन पर मौजूद डिजिटल नेटवर्क से जोड़ा जा सकता है।


अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है तो इसका असर केवल एआई क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। समुद्र आधारित डेटा सेंटर उन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकते हैं जहां जमीन की उपलब्धता सीमित है या पारंपरिक डेटा सेंटरो के लिए ऊर्जा और कूलिंग बड़ी चुनौती हैं। भविष्य में ऐसे प्लेटफॉर्म अपतटीय पवन ऊर्जा, समुद्री ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय स्रोतों के साथ भी जोड़े जा सकते हैं। इससे डेटा सेंटरों के लिए अधिक विविध और स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था विकसित करने का रास्ता खुल सकता है।


हालांकि विचार बेहद आकर्षक है, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर लागू करना आसान नहीं होगा। समुद्री तूफान, ऊंची लहरें, उपकरणों में जंग, समुद्री जीवों का प्रभाव, मरम्मत और सुरक्षा जैसी चुनौतियों का समाधान जरूरी होगा। इसके अलावा समुद्र में डेटा सेंटर स्थापित करने और उसके संचालन की लागत भी महत्वपूर्ण मुद्दा होगी। फिर भी पैंथलासा का प्रयोग इस बात का संकेत देता है कि भविष्य के डेटा सेंटर केवल जमीन पर बने विशाल भवनों तक सीमित नहीं रहेंगे। समुद्र की प्राकृतिक ऊर्जा को डिजिटल कंप्यूटिंग से जोड़ने की यह कोशिश तकनीक और पर्यावरण के बीच नए संबंध की शुरुआत कर सकती है।


एआई का भविष्य अधिक कंप्यूटिंग शक्ति मांग रहा है और दुनिया को उसी अनुपात में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी। ऐसे समय में समुद्री लहरों जैसी प्राकृतिक और नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल करके एआई इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की कोशिश महत्वपूर्ण है। यदि ‘ओशन-2’ जैसे प्रयोग तकनीकी और आर्थिक रूप से सफल साबित होते हैं, तो आने वाले वर्षों में समुद्र की लहरें केवल तटों से टकराती दिखाई नहीं देंगी, बल्कि वे दुनिया की डिजिटल अर्थव्यवस्था को ऊर्जा देने में भी भूमिका निभा सकती हैं।


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