लोकतंत्र केवल चुनाव, सरकार और विपक्ष का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली ताकत उस आवाज में होती है, जो सत्ता के सामने अपनी बात कहने का साहस रखती है। इस दृष्टि से छात्र आंदोलनों का भारतीय लोकतंत्र में अपना विशेष महत्व रहा है। छात्र समाज का वह वर्ग है, जो देश के भविष्य का प्रतिनिधित्व करता है। शिक्षा, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, फीस, छात्रवृत्ति, विश्वविद्यालयों की व्यवस्था और भविष्य की अनिश्चितता जैसे मुद्दे जब छात्रों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर करते हैं, तो उनकी आवाज को सुना जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
छात्रों की आवाज को राजनीतिक समर्थन मिलना अपने आप में लोकतंत्र की कमजोरी नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। राजनीतिक दल जनसमस्याओं को उठाते हैं, आंदोलनों के साथ खड़े होते हैं और सरकार पर दबाव बनाते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब वास्तविक छात्र मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और आंदोलन किसी राजनीतिक दल के शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाता है। यहीं से प्रशन उठता है कि छात्र आंदोलन को समर्थन देना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन क्या छात्रों की आवाज का राजनीतिक अपहरण भी लोकतांत्रिक अधिकार माना जा सकता है?
भारत के इतिहास में छात्र आंदोलनों की लंबी परंपरा रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक आंदोलनों तक विद्यार्थियों ने अपनी भूमिका निभाई है। कई बड़े जनआंदोलनों में छात्रों ने अग्रिम पंक्ति में रहकर व्यवस्था को चुनौती दी और सामाजिक बदलाव की दिशा तैयार की। इसलिए आज यदि छात्र अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलन करते हैं, तो उसे केवल राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। उनकी समस्याओं की वास्तविकता को समझना आवश्यक है। लेकिन दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की भूमिका को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लोकतंत्र में राजनीतिक दल जनभावनाओं को राजनीतिक विमर्श में बदलते हैं। वे आंदोलनकारियों की आवाज संसद और विधानसभा तक पहुंचा सकते हैं। वे सरकार को जवाबदेह बनाने में भूमिका निभा सकते हैं।
खतरा तब पैदा होता है जब छात्र आंदोलन का नेतृत्व, एजेंडा और दृश्य पूरी तरह राजनीतिक दलों के हाथ में चला जाए। तब आंदोलन छात्र समस्या से अधिक पार्टी कार्यक्रम दिखाई देने लगता है। आंदोलन की आत्मा छात्र हो और राजनीतिक दल उसका समर्थन करें, यह लोकतंत्र है। लेकिन आंदोलन की आत्मा राजनीतिक दल बन जाए और छात्र केवल चेहरा रह जाएं तो यह लोकतंत्र की गंभीर कमजोरी है।
हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्र और युवा आंदोलनों ने राजनीतिक बहस को प्रभावित किया है। दिल्ली हो, रांची हो या पटना। जहां भी युवा या छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, वहां राजनीतिक दलों की सक्रियता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। राजनीतिक दलों के लिए युवा वर्ग स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है। युवा मतदाता भविष्य की राजनीति की दिशा तय करता है। इसलिए युवाओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश हर राजनीतिक दल करता है। लेकिन यहां लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है। क्या राजनीतिक समर्थन छात्र आंदोलन की ताकत बढ़ा रहा है या धीरे-धीरे आंदोलन की स्वतंत्र पहचान को खत्म कर रहा है? यह प्रशन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज आंदोलन केवल सड़क पर नहीं होता है। कैमरा, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया आंदोलन की तस्वीर को कुछ ही मिनटों में पूरे देश तक पहुंचा देते हैं। आंदोलन में कौन-सा झंडा है, कौन-सा नारा है, कौन आगे चल रहा है और पुलिस की कार्रवाई कैसी है, ये सभी दृश्य राजनीतिक संदेश में बदल जाते हैं। ऐसे में प्रतीकों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
राष्ट्रीय ध्वज भारत की संप्रभुता, एकता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। तिरंगे का अर्थ किसी राजनीतिक दल की विचारधारा, सरकार के समर्थन या विरोध से कहीं बड़ा है। राजनीतिक दल आते-जाते हैं। सरकारें बदलती हैं। विपक्ष सत्ता में आता है और सत्ता विपक्ष में जाती है। चुनाव परिणाम राजनीतिक समीकरण बदल देते हैं। लेकिन तिरंगा इन सभी राजनीतिक बदलावों से ऊपर राष्ट्र की पहचान का प्रतीक बना रहता है। इसलिए किसी राजनीतिक आंदोलन में राष्ट्रीय ध्वज के इस्तेमाल को लेकर विशेष संवेदनशीलता आवश्यक है। बुधवार को पटना में लोकभवन मार्च के दौरान पुलिस की पानी की बौछार के बीच प्रदर्शनकारियों के साथ राष्ट्रीय ध्वज के भीगते और गिरते हुए दृश्य ने इसी प्रश्न को सामने ला दिया है। यह केवल एक राजनीतिक घटना का दृश्य नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीक की गरिमा को लेकर गंभीर चिंता पैदा करने वाला प्रसंग भी था। यहां उद्देश्य किसी दल या प्रदर्शनकारी की नीयत पर अंतिम फैसला सुनाना नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध प्रदर्शन में तिरंगे को ऐसे हालात में ले जाना उचित है, जहां उसके गिरने, घसीटने या अपमानजनक स्थिति में पहुंचने की आशंका हो? यदि उत्तर नहीं है, तो राजनीतिक दलों और आंदोलनों को इस विषय में अधिक जिम्मेदार होना ही होगा।
राजनीतिक दलों के अपने झंडे और प्रतीक होते हैं। वे अपने संगठन, विचारधारा और राजनीतिक पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय ध्वज पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है। यह अंतर केवल रंगों और डिजाइन का अंतर नहीं है। यह संवैधानिक और भावनात्मक अंतर है। राजनीतिक विरोध करना है तो पार्टी का झंडा उठाइए। सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना है तो पार्टी का बैनर लगाइए। अपनी विचारधारा का प्रचार करना है तो अपने राजनीतिक प्रतीकों का इस्तेमाल कीजिए। लेकिन राष्ट्रीय ध्वज को राजनीतिक आवरण बना देना उचित नहीं हो सकता है। आज यदि किसी राजनीतिक दल को विरोध प्रदर्शन में तिरंगे के इस्तेमाल से अतिरिक्त भावनात्मक और दृश्यात्मक लाभ मिलता है, तो कल दूसरा दल भी यही करेगा। फिर धीरे-धीरे राष्ट्रीय ध्वज राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन सकता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए शुभ नहीं होगी।
भारत में अक्सर राजनीतिक बहस इतनी तीखी हो जाती है कि राष्ट्र और सरकार के बीच का अंतर धुंधला पड़ जाता है। सरकार की आलोचना को राष्ट्र की आलोचना मानना गलत है। उसी तरह सरकार के विरोध को राष्ट्र-विरोध मानना भी लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है। सरकार बदलेगी, नीतियां बदलेगी, राजनीतिक दल बदलेंगे, लेकिन राष्ट्र बना रहेगा। इसी प्रकार तिरंगा किसी सरकार का झंडा नहीं है। वह भारत गणराज्य का राष्ट्रीय ध्वज है। इसलिए उसे न तो सत्ता पक्ष की संपत्ति समझा जा सकता है और न विपक्ष के विरोध का औजार बनाया जा सकता है। यह सरल-सा सिद्धांत राजनीतिक दलों, आंदोलनों और नागरिकों और सभी को समझना होगा।
राजनीति से पूरी तरह मुक्त छात्र आंदोलन की कल्पना शायद व्यावहारिक नहीं है। छात्र स्वयं लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा हैं। उनमें राजनीतिक चेतना होना स्वाभाविक है। राजनीतिक दल भी छात्रों की समस्याओं को उठाएं, यह लोकतंत्र में स्वीकार्य है। लेकिन राजनीति का केंद्र छात्र समस्या होनी चाहिए, राजनीतिक लाभ नहीं। यदि परीक्षा व्यवस्था में खामी है, तो उस पर चर्चा हो। यदि रोजगार का संकट है, तो सरकार से सवाल पूछा जाए। यदि छात्रवृत्ति में देरी है, तो उसका समाधान मांगा जाए। यदि विश्वविद्यालयों में अव्यवस्था है, तो प्रशासन को जवाबदेह बनाया जाए। लेकिन यदि वास्तविक मुद्दा पीछे चला जाए और मंच पर केवल पार्टी के नेता, पार्टी का झंडा और राजनीतिक नारे रह जाएं, तो आंदोलन की विश्वसनीयता कमजोर होती है। छात्रों को भी यह समझना होगा कि उनकी ऊर्जा किसी राजनीतिक दल की रणनीति का ईंधन न बने। वे अपने मुद्दों पर स्पष्ट रहें और किसी भी दल से समर्थन लेते समय अपनी स्वतंत्रता बनाए रखें।
लोकतंत्र में प्रदर्शनकारियों की जिम्मेदारी है कि वे कानून और सार्वजनिक व्यवस्था का सम्मान करें। लेकिन राज्य की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। पुलिस को प्रदर्शन रोकने का अधिकार कानून के दायरे में है, लेकिन बल प्रयोग की हर कार्रवाई संतुलित, आवश्यक और अनुपातिक होनी चाहिए। खासकर जब प्रदर्शन में राष्ट्रीय ध्वज मौजूद हो, तब पुलिस और प्रशासन को भी अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। पानी की बौछार, बैरिकेडिंग या अन्य उपायों के दौरान यदि राष्ट्रीय ध्वज जमीन पर गिरता है, तो उसकी गरिमा बनाए रखने के लिए तत्काल कदम उठाना प्रशासन की जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में केवल प्रदर्शनकारियों से मर्यादा की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। सत्ता और सड़क, दोनों को लोकतांत्रिक मर्यादा का पालन करना होगा।
आज आंदोलन की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने लोग सड़क पर उतरे। एक तस्वीर, एक वीडियो या कुछ सेकंड का दृश्य पूरे राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है। पानी की बौछार में गिरता व्यक्ति, पुलिस से भिड़ते प्रदर्शनकारी, हाथ में तिरंगा लिए युवा या सड़क पर पड़ा राष्ट्रीय ध्वज, ऐसे दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से फैलते हैं। इन दृश्यों का भावनात्मक प्रभाव किसी लंबे भाषण से अधिक हो सकता है। इसलिए राजनीतिक दलों को समझना होगा कि कैमरे के सामने किया गया हर कार्य इतिहास का हिस्सा बन सकता है। तिरंगा हाथ में लेना केवल फोटो खिंचवाने का विषय नहीं है। उसके साथ राष्ट्रीय सम्मान की जिम्मेदारी भी जुड़ी है।
लगता है कि अब समय आ गया है कि राजनीतिक दल स्वयं इस विषय में आचार-संहिता बनाएं। प्रदर्शन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल कब होगा, कैसे होगा और किन परिस्थितियों में नहीं होगा, इस पर स्पष्ट नियम होने चाहिए। इसी तरह छात्र संगठनों को भी अपने आंदोलन के लिए आचार-संहिता तैयार करनी चाहिए। आंदोलन शांतिपूर्ण हो। राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान न पहुंचे। आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानी न हो। राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान हो। पुलिस के साथ टकराव को लक्ष्य न बनाया जाए और वास्तविक छात्र मुद्दे केंद्र में रहे। ऐसी मर्यादा आंदोलन को कमजोर नहीं करती है, बल्कि उसकी नैतिक शक्ति बढ़ाती है।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। युवा केवल वोटर नहीं हैं, वे देश के भविष्य के निर्माता हैं। इसलिए युवाओं की आवाज को राजनीतिक दलों द्वारा सुना जाना चाहिए, लेकिन उन्हें राजनीतिक मोहरा नहीं बनाया जाना चाहिए। युवा यदि बेरोजगारी पर सवाल पूछते हैं तो उसका जवाब चाहिए। यदि परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठाते हैं तो सुधार चाहिए। यदि शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल करते हैं तो नीति में बदलाव चाहिए। युवाओं को केवल चुनाव के समय याद करना और आंदोलन के समय उनके कंधे पर राजनीतिक बंदूक रखना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता है। राजनीतिक दलों को युवाओं के बीच जाने से पहले उनके सवालों को समझना होगा। युवा किसी दल की सीढ़ी नहीं, लोकतंत्र की नींव हैं।
भारत में राष्ट्रीय ध्वज केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं है। इसके साथ करोड़ों भारतीयों की भावनाएं जुड़ी हैं। सीमा पर खड़ा सैनिक, खेत में काम करता किसान, प्रयोगशाला में काम करता वैज्ञानिक, स्कूल में पढ़ता बच्चा और मतदान केंद्र पर कतार में खड़ा नागरिक, सभी के लिए तिरंगा समान है। इसलिए उसका सम्मान राजनीतिक मतभेदों से ऊपर होना चाहिए। सरकार का विरोध कीजिए। विपक्ष की आलोचना कीजिए। राजनीतिक दलों से सवाल कीजिए। सड़कों पर प्रदर्शन कीजिए। लोकतंत्र में यह सब अधिकार है। लेकिन राष्ट्र के प्रतीकों को राजनीतिक संघर्ष की चपेट में आने से बचाना भी उतना ही आवश्यक है।
छात्र आंदोलन लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण हैं। छात्रों की आवाज को दबाना लोकतंत्र को कमजोर करता है। लेकिन छात्रों की आवाज को राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करना भी लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। राजनीतिक दलों का समर्थन आंदोलन को शक्ति दे सकता है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता छीनने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए। पटना के हालिया घटनाक्रम ने कम से कम इतना सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या हमें राजनीतिक आंदोलनों में राष्ट्रीय प्रतीकों के इस्तेमाल की मर्यादा पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक दल के पक्ष या विरोध में नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित में तलाशना होगा। तिरंगा न भाजपा का है, न राजद का, न कांग्रेस का, न किसी अन्य राजनीतिक दल का। तिरंगा भारत का है। इसलिए हर राजनीतिक दल को यह संकल्प लेना चाहिए कि सत्ता की लड़ाई चाहे जितनी तीखी हो, राष्ट्रीय प्रतीकों को उसकी राजनीति का हथियार नहीं बनाया जाएगा और हर भारतीय को यह याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में विरोध करना अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान करना कर्तव्य। छात्रों की आवाज बुलंद होनी चाहिए, राजनीति उनकी आवाज सुने, लेकिन तिरंगा किसी राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का आवरण कभी नहीं बनना चाहिए। यही लोकतांत्रिक मर्यादा है, यही राष्ट्र के प्रति सम्मान है और यही सच्चे अर्थों में लोकतंत्र की पहचान भी है।

