दलदल में खड़ा मुखिया और डेढ़ अरब उम्मीदों का भारत

Jitendra Kumar Sinha
0

 


जब किसी इंसान का पांव अचानक दलदल को छूता है तो सबसे पहले उसके चेहरे पर घबराहट आती है। वह जितना हाथ-पैर मारता है, उतना ही गहराई में धंसने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे समय में समझदार व्यक्ति शोर नहीं करता है। वह कुछ क्षणों के लिए खुद को स्थिर करता है, स्थिति का आकलन करता है और फिर बाहर निकलने का रास्ता तलाशता है। परिवार का मुखिया भी कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजरता है। घर में पांच लोग हो या दस, जिम्मेदारी का वास्तविक भार अक्सर उस व्यक्ति के कंधे पर होता है जिसे परिवार का मुखिया माना जाता है। घर के बाकी सदस्य परेशान हो सकते हैं, नाराज हो सकते हैं, अपनी-अपनी राय दे सकते हैं, यहां तक कि मुखिया को उसकी कथित कमजोरियों के लिए कटघरे में भी खड़ा कर सकते हैं, लेकिन संकट की घड़ी में बिलों का हिसाब, बच्चों का भविष्य, बुजुर्गों की दवा, रोजगार की चिंता, सामाजिक प्रतिष्ठा और आने वाले कल की अनिश्चितता, इन सबका जोड़-घटाव उसी व्यक्ति के दिमाग में चलता रहता है। कई बार वह बोलता नहीं है। कई बार वह अपने मन की बेचैनी किसी को बताता भी नहीं है। कई बार वह मुस्कुराता रहता है ताकि परिवार के दूसरे लोगों को यह महसूस न हो कि नाव का मल्लाह स्वयं तूफान से डर रहा है और यही वह बिंदु है जहां हमें एक बहुत बड़े सवाल पर विचार करना चाहिए।


क्या चुप रहने वाला व्यक्ति वास्तव में कमजोर होता है? शायद नहीं। कई बार उसकी चुप्पी के पीछे कायरता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का पहाड़ खड़ा होता है। वह जानता है कि उसके एक गलत शब्द से घर का माहौल बिगड़ सकता है। उसके एक गलत निर्णय से वर्षों की मेहनत मिट्टी में मिल सकती है। इसलिए वह अपनी भावनाओं को दबाकर परिवार के लिए रास्ता तलाशता रहता है। राष्ट्र भी एक विशाल परिवार ही तो है। अंतर सिर्फ इतना है कि घर में जिम्मेदारी कुछ लोगों की होती है और राष्ट्र में जिम्मेदारी करोड़ों-करोड़ लोगों की। भारत जैसे विशाल देश में यह जिम्मेदारी कितनी विकराल होगी, इसका अनुमान लगाना भी आसान नहीं है। 


कल्पना कीजिए, किसी परिवार की आय सीमित हो और खर्च लगातार बढ़ रहे हो। बच्चों की पढ़ाई है, बुजुर्गों की दवा है, घर की मरम्मत है, रोजगार की चिंता है, सामाजिक दायित्व हैं और ऊपर से अचानक कोई बड़ा आर्थिक संकट आ जाए। ऐसे समय में घर का मुखिया हर व्यक्ति को खुश नहीं रख सकता है। उसे प्राथमिकताएं तय करनी पड़ती हैं। किस खर्च को अभी करना है? किसे टालना है? कहां समझौता करना है? कहां बिल्कुल समझौता नहीं करना है? किससे बातचीत करनी है? किससे दूरी बनाए रखनी है? और सबसे महत्वपूर्ण है किस निर्णय का असर आज होगा और किसका असर दस वर्ष बाद दिखाई देगा? यही सवाल किसी राष्ट्र के सामने भी होते हैं। लेकिन राष्ट्र के मामले में आंकड़े कहीं अधिक विशाल होते हैं। भारत की आबादी लगभग डेढ़ अरब है। करोड़ों परिवारों की अलग-अलग आवश्यकताएं हैं। अलग-अलग भाषाएं हैं। अलग-अलग प्रदेश हैं। अलग-अलग आर्थिक परिस्थितियां हैं। किसानों की समस्या अलग है, मजदूरों की अलग। उद्योगों की चिंता अलग है, नौकरी तलाश रहे युवाओं की अलग। विदेश में काम कर रहे भारतीयों की अपनी चिंता है तो देश में रहने वाले लोगों की अपनी अपेक्षाएं। इन सबको एक दिशा में लेकर चलना किसी साधारण प्रबंधन का विषय नहीं है। यह एक असाधारण जिम्मेदारी है और यही कारण है कि जब किसी देश पर बाहरी दबाव आता है तो सरकार की प्रतिक्रिया को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना हमेशा उचित नहीं होता है।


पिछले कुछ दिनों में अमेरिका की व्यापार और आव्रजन नीतियों को लेकर भारत में जिस प्रकार की चर्चा तेज हुई है, उसने एक बार फिर यह प्रश्न सामने रखा है कि वैश्विक राजनीति में राष्ट्रीय हितों की रक्षा किस तरह की जाती है। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और वित्तीय शक्तियों में से एक है। डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में केंद्रीय भूमिका निभाता है। अमेरिकी बाजार का आकार विशाल है। तकनीक, वित्त, रक्षा, शिक्षा और वैश्विक निवेश, कई क्षेत्रों में अमेरिका की भूमिका निर्णायक है। दूसरी तरफ भारत भी अब वह भारत नहीं है जिसे वैश्विक दबावों के सामने केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश माना जाए। भारत एक विशाल बाजार है। भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में है। भारत के पास विशाल युवा आबादी है। भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। भारत का विनिर्माण क्षेत्र विस्तार कर रहा है। भारत अंतरिक्ष, डिजिटल भुगतान, दवा उद्योग, सेवा क्षेत्र और तकनीकी प्रतिभा के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है। इसलिए भारत-अमेरिका संबंधों को केवल किसी एक शुल्क, किसी एक वीजा नीति या किसी एक राजनीतिक बयान के आधार पर समझना भूल होगी। यह एक बहुत बड़ी और जटिल वैश्विक साझेदारी है।


अमेरिकी व्यापार नीति में टैरिफ का इस्तेमाल नया नहीं है। दुनिया के अनेक देशों ने अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता के दौरान इसी चुनौती का सामना किया है। लेकिन जब किसी बड़े देश द्वारा भारतीय उत्पादों पर ऊंचे शुल्क की बात सामने आती है तो उसका प्रभाव केवल सरकार तक सीमित नहीं रहता है। उसका असर उद्योग पर पड़ता है। उद्योग का असर रोजगार पर पड़ता है। रोजगार का असर परिवारों पर पड़ता है और अंततः उसका असर आम उपभोक्ता तक पहुंचता है। यही कारण है कि व्यापार युद्ध का अर्थ केवल दो देशों के बीच आंकड़ों की लड़ाई नहीं होता है। यह लाखों लोगों की रोजी-रोटी, निवेश की योजनाओं और उद्योगों के भविष्य का प्रश्न बन सकता है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने हितों की रक्षा करते हुए ऐसी स्थिति न बनने दे जिसमें उसके निर्यातक अनावश्यक रूप से कमजोर पड़े। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत को यह भी देखना होगा कि उसकी अर्थव्यवस्था केवल किसी एक देश के बाजार पर निर्भर न रहे।


यूरोप, एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, पश्चिम एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया, भारत के लिए सभी महत्वपूर्ण बाजार हो सकते हैं। H-1B का सवाल और भारतीय प्रतिभा की चिंता अमेरिका की आव्रजन नीति का भारतीय पेशेवरों पर प्रभाव लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। H-1B जैसे वीजा कार्यक्रमों के माध्यम से बड़ी संख्या में भारतीय तकनीकी पेशेवर अमेरिका की अर्थव्यवस्था में योगदान करते रहे हैं। सॉफ्टवेयर इंजीनियर से लेकर वैज्ञानिक, चिकित्सक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ तक, भारतीय प्रतिभा ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। इसलिए जब अमेरिकी आव्रजन नीति में कोई कठोर बदलाव सामने आता है तो उसका असर केवल वीजा पाने वाले व्यक्ति पर नहीं पड़ता है। उसके पीछे एक पूरा परिवार होता है। बच्चों की पढ़ाई होती है। घर का कर्ज होता है। करियर की योजना होती है। कई वर्षों का निवेश होता है और सबसे बढ़कर भविष्य की अनिश्चितता होती है। इसीलिए भारत के लिए यह विषय भावनात्मक होने के साथ-साथ आर्थिक और कूटनीतिक भी है। 


भारत को अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करनी है। लेकिन उसे यह काम भावनात्मक उत्तेजना से नहीं, रणनीतिक समझदारी से करना होगा। क्या हर चुप्पी बुजदिली होती है? यह सवाल आज केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक भी है। हमारे समाज में अक्सर मुखर व्यक्ति को मजबूत और शांत व्यक्ति को कमजोर समझ लिया जाता है। जो सबसे ज्यादा बोलता है, उसे साहसी मान लिया जाता है। जो सबसे ज्यादा आरोप लगाता है, उसे सक्रिय मान लिया जाता है। जो हर संकट पर तत्काल प्रतिक्रिया देता है, उसे निर्णायक माना जाता है। लेकिन प्रशासन और राष्ट्र संचालन का वास्तविक सिद्धांत कुछ अलग है। हर संकट का जवाब तत्काल बयान नहीं होता है। कई बार बातचीत करनी होती है। कई बार आंकड़े जुटाने होते हैं। कई बार विकल्प तैयार करने होते हैं। कई बार सामने वाले की अगली चाल का अनुमान लगाना होता है और कई बार जनता के सामने जितना दिखाई देता है, उसके पीछे उससे कहीं अधिक कूटनीतिक गतिविधियां चल रही होती हैं। इसलिए किसी सरकार की हर चुप्पी को कायरता कहना उचित नहीं है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि सरकार से सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए। लोकतंत्र में सवाल जरूरी हैं। आलोचना जरूरी है। विपक्ष जरूरी है। मीडिया की निगरानी जरूरी है। लेकिन आलोचना और राष्ट्रहित विरोधी मानसिकता में अंतर होना चाहिए।


जब किसी देश की नीतियां हमारे हितों के खिलाफ दिखाई दें तो प्रतिक्रिया के दो अतिवादी रास्ते सामने आते हैं। एक कहता है कि सब कुछ स्वीकार कर लो। दूसरा कहता है कि संबंध तोड़ दो। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोनों ही रास्ते हमेशा व्यावहारिक नहीं होते हैं। भारत को अमेरिका पर हमला नहीं करना है। भारत को अमेरिका का बहिष्कार करने की जरूरत नहीं है। भारत को अमेरिकी अर्थव्यवस्था से पूरी तरह अलग होने की आवश्यकता भी नहीं है। भारत को करना यह है कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए संबंधों को संतुलित बनाए रखना है। यही कूटनीति है। यही परिपक्व राष्ट्र नीति है। दुनिया में कोई स्थायी मित्र या स्थायी शत्रु नहीं होता है। स्थायी होते हैं “राष्ट्रीय हित”। आज जिन देशों के बीच व्यापारिक विवाद है, कल वही देश किसी दूसरे क्षेत्र में सहयोगी हो सकते हैं। आज जिनके बीच रणनीतिक मतभेद हैं, कल वे किसी वैश्विक संकट पर साथ खड़े हो सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंध भावनाओं से नहीं चलते हैं। वे हितों, शक्ति, बाजार, सुरक्षा और रणनीतिक आवश्यकता से चलते हैं।


अमेरिकी डॉलर की वैश्विक भूमिका को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, केंद्रीय बैंक के भंडार, वैश्विक वित्तीय बाजार और अनेक देशों की आर्थिक व्यवस्था में डॉलर की बड़ी भूमिका है। यही उसकी ताकत है। लेकिन इस ताकत का अर्थ यह नहीं कि दुनिया हमेशा एक ही मुद्रा या एक ही आर्थिक केंद्र पर निर्भर रहेगी। पिछले वर्षों में दुनिया के अनेक देश वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों, स्थानीय मुद्राओं और क्षेत्रीय व्यापार व्यवस्थाओं की दिशा में सोच रहे हैं। भारत भी अपने व्यापारिक संबंधों में विविधता और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था की संभावनाओं पर काम करता रहा है। लेकिन यह परिवर्तन रातोंरात नहीं हो सकता है। किसी भी बड़ी आर्थिक व्यवस्था को बदलने में दशको लग सकते हैं। इसलिए भारत की रणनीति भावनात्मक घोषणा नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे आर्थिक आत्मविश्वास बढ़ाने की होनी चाहिए।


भारत आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। करीब 4.2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के रूप में भारत का आकार इतना बड़ा हो चुका है कि दुनिया भारत को नजरअंदाज नहीं कर सकती है। लेकिन केवल अर्थव्यवस्था का आकार पर्याप्त नहीं। जरूरी है रोजगार बढ़े। प्रति व्यक्ति आय बढ़े। गरीबी घटे। स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हो। शिक्षा की गुणवत्ता बढ़े। कृषि उत्पादकता बढ़े। विनिर्माण मजबूत हो। निर्यात बढ़े। तकनीकी क्षमता बढ़े और सबसे महत्वपूर्ण है कि भारतीय नागरिक का जीवन स्तर बेहतर हो। 6-7 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि यदि निरंतर बनी रहती है और उसके लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचते हैं तो यह भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। डेढ़ अरब लोगों का देश और एक विशाल जिम्मेदारी किसी देश को चलाना केवल GDP के आंकड़े संभालना नहीं है। यह करोड़ों सपनों को संभालना है। एक किसान चाहता है कि उसकी फसल का उचित मूल्य मिले। एक मजदूर चाहता है कि उसके बच्चों का भविष्य बेहतर हो। एक युवा नौकरी चाहता है। एक उद्यमी स्थिर नीतियां चाहता है। एक महिला सुरक्षित वातावरण चाहती है। एक विद्यार्थी बेहतर शिक्षा चाहता है। एक बुजुर्ग सम्मान और स्वास्थ्य सुविधा चाहता है। एक सैनिक चाहता है कि देश उसके पीछे मजबूती से खड़ा रहे। विदेश में रहने वाला भारतीय चाहता है कि संकट के समय उसका देश उसकी आवाज बने। इन सभी अपेक्षाओं का कुल योग ही भारत है और यही वह दलदल है जिसकी गहराई को बाहर खड़े होकर समझना मुश्किल है।


भारतीय राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं। नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी अलग राजनीतिक विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी नीतियों पर बहस होनी चाहिए। उनके फैसलों पर सवाल उठने चाहिए। सरकार की गलतियों की आलोचना होनी चाहिए। विपक्ष की रणनीति पर भी चर्चा होनी चाहिए। लेकिन एक प्रश्न इन सबके ऊपर होना चाहिए कि क्या हम राजनीतिक मतभेदों से ऊपर राष्ट्रीय हित को रख पा रहे हैं? यदि विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक संकट या किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव के समय देश के भीतर ही हम एक-दूसरे को कमजोर करने में लग जाएं तो इससे अंततः नुकसान देश का ही होता है। सरकार बदल सकती है। प्रधानमंत्री बदल सकता है। विपक्ष सत्ता में आ सकता है। लेकिन भारत बना रहता है। इसीलिए राष्ट्र किसी व्यक्ति से बड़ा है। राजनीति की गर्मी और राष्ट्रहित की ठंडक, राजनीतिक दलों का काम सरकार की आलोचना करना है। लेकिन आलोचना के भी कई स्तर होते हैं। एक आलोचना होती है “आपका निर्णय गलत है, यह बेहतर विकल्प है।” दूसरी होती है “आप हर चीज में विफल हैं।” तीसरी होती है “देश संकट में है और सरकार कुछ नहीं कर रही।” इन तीनों का राजनीतिक प्रभाव अलग होता है। लोकतंत्र में तीखी आलोचना भी आवश्यक हो सकती है। लेकिन जब राष्ट्रीय संकट के समय आरोप-प्रत्यारोप इतना बढ़ जाए कि जनता के बीच यह संदेश जाने लगे कि देश स्वयं असहाय है, तब सावधानी आवश्यक हो जाती है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल सरकार नहीं बोलती है। देश की छवि भी बोलती है। क्या भारत को चुप रहना चाहिए? बिल्कुल नहीं। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। शांत रहना और चुप रहना एक बात नहीं है। भारत को अपने हितों पर दृढ़ रहना चाहिए।

जहां आवश्यकता हो, वहां बातचीत करनी चाहिए। जहां नुकसान हो रहा हो, वहां प्रतिरोध दर्ज करना चाहिए। जहां व्यापारिक हित प्रभावित हो, वहां विकल्प तलाशने चाहिए। जहां भारतीय नागरिकों के अधिकार प्रभावित हो, वहां उनकी सुरक्षा और सम्मान की बात करनी चाहिए। लेकिन यह सब संतुलित और रणनीतिक तरीके से होना चाहिए। कूटनीति में आवाज की ऊंचाई से अधिक महत्व शब्दों की दिशा का होता है।


यदि भारत किसी देश की व्यापारिक नीति से प्रभावित होता है तो उसका सबसे प्रभावी उत्तर हमेशा नारे नहीं होते हैं। कई बार सबसे प्रभावी उत्तर होता है कि अपने उत्पाद को इतना प्रतिस्पर्धी बना देना कि दुनिया उसे खरीदना चाहे। भारत को उत्पादन लागत घटानी होगी। लॉजिस्टिक्स बेहतर करना होगा। गुणवत्ता सुधारनी होगी। निर्यातकों को सुविधाएं देनी होगी। छोटे उद्योगों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ना होगा। अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाना होगा। कौशल विकास को रोजगार से जोड़ना होगा और सबसे महत्वपूर्ण है भारतीय ब्रांड को वैश्विक ब्रांड बनाना होगा। जब भारतीय उत्पाद दुनिया के बाजार में अपनी गुणवत्ता और कीमत के कारण जगह बनाएंगे, तब भारत की आर्थिक शक्ति स्वयं उसकी कूटनीतिक शक्ति बन जाएगी। भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादियों में से एक है। यह चुनौती भी है और अवसर भी। यदि युवाओं को शिक्षा, कौशल और रोजगार मिलता है तो यही आबादी भारत को विश्व की अग्रणी आर्थिक शक्ति बना सकती है। लेकिन यदि युवाओं को रोजगार नहीं मिलता है तो यही जनसांख्यिकीय लाभ चुनौती में बदल सकता है। इसलिए भारत की विदेश नीति से लेकर घरेलू राजनीति तक हर चर्चा के केंद्र में रोजगार होना चाहिए।

एक युवा को अमेरिका की नीति पर केवल इसलिए चिंता नहीं होनी चाहिए कि वहां उसका रोजगार प्रभावित हो सकता है। उसे भारत में भी ऐसे अवसर मिलने चाहिए कि उसके सामने विकल्प मौजूद रहे। आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ यही है कि दुनिया से कटना नहीं है, बल्कि दुनिया के सामने मजबूती से खड़ा होना है। दुनिया के अनेक देशों में भारतीय मूल के लोग अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर महत्वपूर्ण स्थान बना चुके हैं। विशेष रूप से तकनीक, चिकित्सा, शिक्षा, वित्त और उद्यमिता के क्षेत्र में भारतीय मूल के लोगों की बड़ी भूमिका है। वे भारत की अनौपचारिक आर्थिक और सांस्कृतिक शक्ति भी हैं। जब उनकी स्थिति किसी देश की नीति से प्रभावित होती है तो भारत के लिए उनकी चिंता स्वाभाविक है। लेकिन यहां भी संतुलन जरूरी है। दुनिया का कोई भी बड़ा देश पूरी तरह अकेला नहीं चल सकता। भारत को अमेरिका की जरूरत है। अमेरिका को भी भारत की जरूरत है। यही अंतरराष्ट्रीय संबंधों की वास्तविकता है। दूसरी ओर भारत को अमेरिकी तकनीक, निवेश, बाजार और शिक्षा-व्यवस्था से भी लाभ मिलता है। इसलिए संबंधों को संतुलित करना ही समाधान है। 


नरेन्द्र मोदी की आलोचना हो सकती है, भारत की नही। किसी प्रधानमंत्री की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है। किसी सरकार की नीति पर सवाल उठाना भी अधिकार है। लेकिन भारत की सामूहिक क्षमता पर अविश्वास पैदा करना अलग बात है। प्रधानमंत्री आएंगे-जाएंगे। सरकारें बनेगी और गिरेगी। राजनीतिक दल जीतेंगे और हारेंगे। लेकिन देश कायम रहेगा। इसलिए व्यक्ति के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष को राष्ट्र के खिलाफ मानसिकता में बदल देना लोकतंत्र के लिए भी नुकसानदेह है और यही बात राहुल गांधी पर भी लागू होती है। एक देश, अनेक विचार यही भारत है। भारत की खूबसूरती यही है कि यहां विचारों की विविधता है। कोई सरकार के पक्ष में है। कोई विपक्ष के पक्ष में। कोई दोनों से असहमत है। कोई राजनीति से दूर है। लेकिन सभी के पास एक साझा पहचान है भारतीय। यही पहचान सबसे ऊपर होनी चाहिए।


एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top