कश्मीर के पहलगाम में हुए वीभत्स आतंकी हमले ने भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही तनावग्रस्त संबंधों को और गहरा कर दिया है। भारत ने कठोर कदम उठाते हुए सिंधु जल संधि सहित कई समझौतों को स्थगित कर दिया है, वहीं पाकिस्तान ने प्रतिशोध में शिमला समझौते को निलंबित कर दिया है। इन घटनाओं ने दोनों देशों के बीच दशकों से चले आ रहे कूटनीतिक ढांचे को हिला कर रख दिया है।
सुत्रों के अनुसार, भारत और पाकिस्तान के बीच 1950 में हस्ताक्षरित समझौता हुआ था नेहरू - लियाकत समझौता (1950), जो अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए था। दोनों देशों ने वचन दिया था कि वे अपने-अपने यहां रहने वाले अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सुरक्षा की गारंटी देंगे। इसके कार्यान्वयन के लिए 'अल्पसंख्यक आयोग' जैसी संस्थाओं की भी कल्पना की गई थी। भारत ने इस समझौते की भावना का पालन करते हुए अपने अल्पसंख्यकों को समान अधिकार और अवसर दिया। वहीं, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, जबरन धर्मांतरण और पलायन जैसी घटनाएँ बढ़ती चली गईं। आज की तारीख में यह समझौता पाकिस्तान में सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है।
विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए सिंधु जल संधि समझौता (1960), इस समझौते के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का जल पाकिस्तान को तथा रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का जल भारत को आवंटित किया गया है। इस संधि को वैश्विक स्तर पर सबसे सफल जल-बंटवारे के समझौते के रूप में देखा गया। पिछले 65 वर्षों से यह संधि लगभग निर्विवाद चली, लेकिन हाल के आतंकी हमलों के बाद भारत ने इसे स्थगित करने का संकेत दिया है। यदि भारत संधि से पूरी तरह हटता है तो पाकिस्तान के लिए जल संकट विकराल रूप ले सकता है और क्षेत्र में संघर्ष की नई लकीरें खिंच सकती हैं।
1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद हस्ताक्षरित शिमला समझौता (1972) में यह तय हुआ कि दोनों देश आपसी विवादों का हल शांतिपूर्ण और द्विपक्षीय तरीकों से करेंगे। इसके तहत नियंत्रण रेखा (एलओसी) का भी सम्मान करने का संकल्प लिया गया। हालिया घटनाओं के मद्देनजर पाकिस्तान द्वारा शिमला समझौते को निलंबित कर दिया है। इस निलंबन से दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव के नए खतरे को जन्म दे सकता है। एलओसी का सम्मान न करने से सीमाओं पर तनाव और बढ़ सकता है।
दोनों देशों ने अपने-अपने धार्मिक स्थलों पर तीर्थयात्रियों की आवाजाही को सुविधाजनक बनाने के लिए यात्रा प्रोटोकॉल (1974) लागू किया था। इसमें भारत के अमृतसर, अजमेर, दिल्ली जैसे स्थान और पाकिस्तान के ननकाना साहिब, करतारपुर साहिब आदि सम्मिलित हैं। अब तक इस प्रोटोकॉल को औपचारिक रूप से निलंबित नहीं किया गया है। लेकिन दोनों देशों के बिगड़ते रिश्ते आने वाले समय में तीर्थ यात्राओं पर भी प्रभाव पर सकता हैं।
दोनों देशों ने परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा संधि (1988) किया है। संधि के अनुसार, भारत और पाकिस्तान हर वर्ष एक-दूसरे को अपने-अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची सौंपते हैं। इसका उद्देश्य था कि अनजाने में या जानबूझकर कोई हमला न हो जो परमाणु आपदा का कारण बन सके। अब तक दोनों देशों ने इस संधि का पालन किया है, लेकिन हालिया तनाव के चलते पाकिस्तान इस संधि को भी समाप्त करने की धमकी दे रहा है। यदि ऐसा होता है तो दक्षिण एशिया में परमाणु संघर्ष का जोखिम और बढ़ जाएगा।
भारत और पाकिस्तान ने अनजाने में हवाई क्षेत्र उल्लंघन से बचने के लिए हवाई क्षेत्र उल्लंघन रोकथाम समझौता (1991) किया है। इस समझौता के तहत सैन्य विमान बिना पूर्व सूचना के एक-दूसरे के हवाई क्षेत्र में नहीं घुसेंगे। पाकिस्तान ने हाल ही में सभी भारतीय विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया है। इससे न केवल नागरिक उड़ानों पर असर पड़ा है, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास की बची-खुची कड़ी भी कमजोर हुई है।
लाहौर घोषणापत्र (1999) ने दक्षिण एशिया में परमाणु हथियारों की दौड़ को खत्म करने और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा था। लेकिन इस घोषणा के महज ढाई महीने बाद ही पाकिस्तान ने करगिल युद्ध छेड़ दिया, जिससे यह पहल पूरी तरह विफल हो गई। इसके बाद से लाहौर घोषणापत्र का कोई औपचारिक अस्तित्व नहीं देखा गया।
नियंत्रण रेखा पर संघर्षविराम को लागू करने के उद्देश्य सेदोनों देशों के बीच युद्ध विराम समझौता (2003) हुआ था। दोनों देशों ने सहमति जताई थी कि वे एलओसी पर फायरिंग और घुसपैठ जैसी घटनाओं से बचेंगे। पाकिस्तान ने 2008 से लगातार संघर्षविराम का उल्लंघन किया है। हालाँकि 2021 में फिर से संघर्षविराम के लिए प्रतिबद्धता जताई गई थी, लेकिन जमीनी हकीकत में कोई खास बदलाव नहीं देखा गया।
1999 में भारत और पाकिस्तान ने बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षणों से पहले एक-दूसरे को सूचित करने का समझौता किया था। साथ ही, परमाणु जोखिम कम करने के लिए भी विभिन्न उपायों पर सहमति बनी थी। यह समझौता अभी तक प्रभावी हैं, लेकिन बढ़ते अविश्वास को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसका चलते भविष्य भी अनिश्चित है।
भारत और पाकिस्तान के बीच अब तक हुए अधिकांश समझौता या तो टूट चुके हैं या टूटने की कगार पर हैं। दोनों देशों में विश्वास की डोर लगातार कमजोर होती जा रही है। मौजूदा हालात में नए समझौतों की संभावनाएँ भी धूमिल दिख रही है। आज का सच्चाई यही है कि भारत अब निर्णायक और कठोर नीतियों की ओर बढ़ रहा है, जबकि पाकिस्तान अपनी आंतरिक अस्थिरता और आतंकवाद को काबू करने में असफल साबित हो रहा है। ऐसे में पुरानी संधियाँ, घोषणाएँ और समझौते अब इतिहास के पन्नों में दफन होते नजर आ रही हैं।
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