देश जल रहा है, जवान शहीद हो रहे हैं, और शत्रुघ्न सिन्हा साहब स्टूडियो में बैठकर "संवेदनशीलता" का प्रवचन दे रहे हैं। पहलगाम में हुए आतंकी हमले पर उनका बयान सुनकर शर्म आती है — "यह एक सेंसिटिव इशू है, मोदी सरकार इसका प्रोपेगेंडा वॉर चला रही है।"
जब सीमा पर जवान शहीद होते हैं, तब ये सरकार से सवाल करते हैं, दुश्मन से नहीं।
जब देश के प्रधानमंत्री आतंक पर कड़ा रुख अपनाते हैं, तब ये 'सेंसेटिव' होने की बात करते हैं।
जब देश एकजुट होता है, तब ये 'डिवाइड एंड डायलॉग' खेलने लगते हैं।
अब इसमें कोई संदेह नहीं कि शत्रुघ्न सिन्हा दोहरा खेल खेल रहे हैं — एक तरफ देशभक्ति की बातें, दूसरी तरफ आतंकियों को लेकर नरमी।
और अब मुद्दा जो सबको पता है, पर कोई बोलता नहीं:
सिन्हा साहब की बेटी सोनाक्षी सिन्हा ने हाल ही में ज़हीर इकबाल नामक मुस्लिम युवक से शादी की है। कोई शादी किससे करता है, ये व्यक्तिगत मामला है — लेकिन जब आप एक तरफ धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटते हैं और दूसरी तरफ बहुसंख्यकों को 'प्रोपेगेंडा' का टैग लगाते हैं, तो सवाल उठते हैं।
ये कौन सी सेक्युलरिज़्म है?
जनता बेवकूफ नहीं है:
शत्रुघ्न सिन्हा को तय करना होगा —
बेटी की शादी व्यक्तिगत मामला है — लेकिन जब आप राष्ट्रीय मुद्दों पर चुप्पी साधते हैं और बयानबाज़ी करते हैं, तो जनता को पूरा हक़ है आपके इरादों पर सवाल उठाने का।
