शत्रुघ्न सिन्हा का दोगलापन: आतंक पर राजनीति, देश पर चुप्पी!

Jitendra Kumar Sinha
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देश जल रहा है, जवान शहीद हो रहे हैं, और शत्रुघ्न सिन्हा साहब स्टूडियो में बैठकर "संवेदनशीलता" का प्रवचन दे रहे हैं। पहलगाम में हुए आतंकी हमले पर उनका बयान सुनकर शर्म आती है — "यह एक सेंसिटिव इशू है, मोदी सरकार इसका प्रोपेगेंडा वॉर चला रही है।"


क्या मतलब है इसका?


जब आतंकवादी हमारे लोगों को गोलियों से छलनी कर रहे हैं, तब ये सीनियर सिटीजन 'प्रोपेगेंडा' ढूंढ रहे हैं?
बोलना है तो आतंकियों के खिलाफ बोलो, देश के खिलाफ क्यों?

जब सीमा पर जवान शहीद होते हैं, तब ये सरकार से सवाल करते हैं, दुश्मन से नहीं।

जब देश के प्रधानमंत्री आतंक पर कड़ा रुख अपनाते हैं, तब ये 'सेंसेटिव' होने की बात करते हैं।

जब देश एकजुट होता है, तब ये 'डिवाइड एंड डायलॉग' खेलने लगते हैं।


अब इसमें कोई संदेह नहीं कि शत्रुघ्न सिन्हा दोहरा खेल खेल रहे हैं — एक तरफ देशभक्ति की बातें, दूसरी तरफ आतंकियों को लेकर नरमी।


और अब मुद्दा जो सबको पता है, पर कोई बोलता नहीं:

सिन्हा साहब की बेटी सोनाक्षी सिन्हा ने हाल ही में ज़हीर इकबाल नामक मुस्लिम युवक से शादी की है। कोई शादी किससे करता है, ये व्यक्तिगत मामला है — लेकिन जब आप एक तरफ धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटते हैं और दूसरी तरफ बहुसंख्यकों को 'प्रोपेगेंडा' का टैग लगाते हैं, तो सवाल उठते हैं।


क्या इसलिए सिन्हा साहब आतंकवादियों के खिलाफ बोलने में हिचक रहे हैं? 

क्या निजी संबंध अब राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर भी असर डालने लगे हैं?

ये कौन सी सेक्युलरिज़्म है?

– जहां आप हिंदू बहुल राष्ट्र में आतंक को 'संवेदनशील' बता दें,
– लेकिन एक शब्द भी उन आतंकी संगठनों के खिलाफ न बोले जो कश्मीर में तबाही मचा रहे हैं?
– क्या ये वोटबैंक सेक्युलरिज़्म है या फिर निजी रिश्तों का असर?

जनता बेवकूफ नहीं है:

देश अब इन पुराने कलाकारों के स्क्रिप्टेड संवादों से नहीं बहलता।
ये वही लोग हैं जो सत्ता में रहते हुए "भारत माता की जय" चिल्लाते थे, और विपक्ष में आते ही "सरकार दोषी है" का राग अलापते हैं।


शत्रुघ्न सिन्हा को तय करना होगा —

क्या वो देश के साथ खड़े हैं, या उन ताकतों के जो भारत को कमजोर करना चाहती हैं?


बेटी की शादी व्यक्तिगत मामला है — लेकिन जब आप राष्ट्रीय मुद्दों पर चुप्पी साधते हैं और बयानबाज़ी करते हैं, तो जनता को पूरा हक़ है आपके इरादों पर सवाल उठाने का।


देश चुप नहीं बैठेगा।

हर मंच पर, हर मंच से पूछेगा:

"आख़िर खामोश कब तक रहोगे, सिन्हा साहब?"


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