"अटारी बॉर्डर पर दिखा दर्द का मंजर - सामने आई जोधपुर की दो महिलाएं”

Jitendra Kumar Sinha
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अक्सर कहा जाता है कि सरहदें दिलों को नहीं बांट सकतीं, लेकिन कभी-कभी ये सरहदें अपनों को एक-दूसरे से जुदा कर देती हैं। कुछ ऐसा ही दर्दनाक मंजर सामने आया जोधपुर की दो महिलाओं आफसीन जहांगीर और अनूदा  के साथ, जो पाक नागरिकता न होने के कारण अटारी बॉर्डर से लौटने को मजबूर हो गईं। अपने बच्चों से बिछड़ने का यह दर्द, न सिर्फ उनकी आंखों से बह रहा था, बल्कि उनके टूटे हुए दिलों से भी छलक रहा था।

पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने देश में रह रहे पाकिस्तानी नागरिकों को 48 घंटे के भीतर भारत छोड़ने का आदेश जारी किया था। इस आदेश के पीछे जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद बढ़ती सुरक्षा चिंताएं थीं। लेकिन इस सख्त फैसले का सीधा असर उन महिलाओं पर भी पड़ा, जो भारतीय मूल की हैं, लेकिन शादी के बाद पाकिस्तान में बस चुकी हैं और अब कुछ समय के लिए अपने मायके आई थीं।

आफसीन जहांगीर और अनूदा उन ही महिलाओं में से थीं, जो अचानक आए इस आदेश से असमंजस में पड़ गईं और जल्दबाजी में अटारी बॉर्डर की ओर रवाना हो गईं।

आफसीन जहांगीर ने 11 वर्ष पूर्व कराची निवासी युवक से निकाह किया था। विवाह के बाद वह अपने पति के साथ कराची में रहने लगीं। दो बच्चे उनके जीवन का केंद्र बन गए। हालांकि, भारतीय नागरिकता उनके पास ही रही और पाक नागरिकता की औपचारिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी थी।

करीब चार साल बाद आफसीन जहांगीर अपने बच्चों के साथ नहीं, बल्कि अकेले ही अपने माता-पिता से मिलने जोधपुर आईं। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। सरकार के नए आदेश ने उनके लिए अचानक आफत खड़ी कर दी।

जब आफसीन जहांगीर अटारी पहुंचीं, तो उम्मीद थी कि जल्द ही अपने बच्चों और पति से मिल जाएंगी। लेकिन भारतीय नागरिकता होने के कारण सीमा सुरक्षा बल ने उन्हें रोक दिया। दुखद यह कि उनके पति और दोनों छोटे बच्चे मां से मिलने के लिए सीमा पार आए थे।

उसी तरह अनूदा का विवाह बीस साल पहले पाकिस्तान में हुआ था। वह अपने परिवार के साथ वही बस गई थी। उनके पास ब्ल्यू पासपोर्ट यानी भारत सरकार द्वारा जारी आपातकालीन यात्रा दस्तावेज था, लेकिन उनकी बेटियों के पास पाकिस्तानी ग्रीन पासपोर्ट था। 

जब अनूदा अपनी दोनों बेटियों के साथ अटारी बॉर्डर पहुंचीं, तो सीमा सुरक्षा बलों ने ग्रीन पासपोर्टधारी बेटियों को पाकिस्तान भेज दिया। लेकिन ब्ल्यू पासपोर्ट होने के कारण अनूदा को रोक लिया गया।

सूत्रों के अनुसार, अटारी बॉर्डर पर सिर्फ आफसीन जहांगीर और अनूदा ही नहीं थीं। करीब तीस महिलाएं वहां एक ही जैसी स्थिति में असहायता और बेबसी के हालात में थी। 

इस दर्दनाक स्थिति का कारण था 'नागरिकता' से जुड़ा मसला। जिन महिलाओं ने विवाह के बाद पाकिस्तान में रहना शुरू किया, उन्होंने भारतीय नागरिकता छोड़ी नहीं थी। वहीं पाक नागरिकता मिली नहीं थी। ऐसी स्थिति में भारतीय पासपोर्ट और पाकिस्तानी वीजा पर यात्रा कर रहीं महिलाएं अब न भारत की रह गईं, न पाकिस्तान की। ब्ल्यू पासपोर्टधारी महिलाएं 'विदेशी' की श्रेणी में आ गईं और बिना उचित पाकिस्तानी पहचान पत्र के पाकिस्तान प्रवेश वर्जित हो गया।

अफसीन जहांगीर और अनूदा, दोनों ने केन्द्र और राज्य सरकार से अनुरोध किया है कि उन्हें जल्द से जल्द अपने बच्चों के पास भेजने की व्यवस्था की जाए। आफसीन जहांगीर का कहना है कि "मेरे छोटे-छोटे बच्चे मेरी राह देख रहे हैं। कोई रास्ता निकालिए।" वहीं, अनूदा का कहना है कि "दोनों बेटियां बहुत छोटी हैं। उन्हें मेरी जरूरत है। मेरी जिन्दगी वहां अटकी है।"

यह घटना केवल कानूनी या प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि मानवीयता की  भी एक बड़ी परीक्षा की घड़ी है। एक मां से उसके बच्चे को अलग कर देना कागजी कार्रवाई के अनुसार सही है लेकिन यह स्थिति एक दिल तोड़ने वाली अमानवीय प्रतीत होती है। सर्वविदित है कि बच्चों के परवरिश और विकास में मां की अहम भूमिका होती है। ऐसे में उन मासूम बच्चों का भविष्य भी दिखता है। भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक तनाव के बीच फंसे गए है ऐसे लोग ।

विशेषज्ञों का माने तो इस तरह के संकट का समाधान मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए निकाला जा सकता है। केन्द्र सरकार विशेष अनुमति देकर इन महिलाओं को बच्चों के पास भेजने पर विचार कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों को इस तरह के समस्याओं का समाधान करने के लिए बीच में आकर मामले को सुलझाने की पहल करनी चाहिए।

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