भारत की ऊर्जा जरूरतें दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं और साथ ही बढ़ रही है अक्षय ऊर्जा की मांग। इस दौड़ में सबसे आगे है सौर ऊर्जा, जो न केवल पर्यावरण के लिए अनुकूल है, बल्कि हमारे ऊर्जा भविष्य की रीढ़ बनती जा रही है। इसी दिशा में आईआईटी बॉम्बे ने एक बड़ी सफलता हासिल किया है। यहां के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सोलर सेल विकसित किया है, जो पारंपरिक सोलर पैनलों की तुलना में 50% ज्यादा बिजली बनाता है और वह भी कम लागत पर। यह तकनीक भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
आईआईटी बॉम्बे के नेशनल सेंटर फॉर फोटावोल्टाइक रिसर्च एंड एजुकेशन (एनसीपीआरई) में प्रोफेसर दिनेश काबरा और उनकी टीम ने जिस तकनीक को विकसित किया है, उसका नाम है "टैडम सोलर सेल"। इस सोलर सेल की खास बात यह है कि इसमें दो परतें होती हैं। पहला ऊपरी परत- हेलाइड पेरोव्स्काइट नामक पदार्थ से बना होता है, जो कम रोशनी में भी बिजली उत्पन्न करता है और दूसरा निचली परत- पारंपरिक सोलर पैनलों की तरह सिलिकॉन से बना होता है। इन दोनों परतों के मिलन से बिजली उत्पादन की क्षमता 30% तक पहुँच गई है, जबकि अब तक के पैनलों में यह 18-22% तक सीमित थी।
टैडम सोलर सेल की संरचना कुछ इस प्रकार होता है कि हेलाइड पेरोव्स्काइट परत सूरज की ऊर्जावान किरणों को पहले अवशोषित करता है और उच्च-ऊर्जा फोटॉनों से बिजली बनाता है। उसके नीचे की सिलिकॉन परत बचे हुए कम-ऊर्जा फोटॉनों को पकड़ता है और उनसे बिजली बनाता है। इस संयोजन से न केवल बिजली उत्पादन ज्यादा होता है, बल्कि तापीय नुकसान भी कम होता है, जिससे दक्षता बढ़ती है। इस तकनीक को अपनाने से न केवल सोलर पैनल की दक्षता बढ़ता है, बल्कि उसकी लागत भी घटता है।
वर्तमान में बाजार में मिलने वाले सोलर पैनल से बनी बिजली की लागत ₹2.5 से ₹4 प्रति यूनिट तक आता है। टैडम सोलर सेल की नई तकनीक से यह लागत घटकर सिर्फ ₹1 प्रति यूनिट तक आ सकता है। यह उस आम नागरिक के लिए भी ऊर्जा सुलभ बनाएगा, जो अभी तक बिजली के खर्च से जूझ रहा था।
इस नई तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह सिर्फ बड़े सोलर फार्मों तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि टैडम सोलर सेल को घरों की छतों, दीवारों, यहां तक कि वाहनों की छतों पर भी आसानी से लगाया जा सकेगा। कम जगह में ज्यादा बिजली उत्पादन होगा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों, पर्वतीय इलाकों और शहरी मलिन बस्तियों तक स्वच्छ ऊर्जा पहुँचाना आसान होगा।
अब तक भारत को सोलर पैनल्स के लिए कच्चा माल, विशेषकर पेरोव्स्काइट पदार्थ, सिलिकॉन वेफर्स, और इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स के लिए चीन और अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन टैडम सोलर सेल के लिए सभी सामग्री भारत में ही बनेगा। इससे आयात पर निर्भरता घटेगा और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को बल मिलेगा। साथ ही, यह राष्ट्रीय सुरक्षा, रोजगार सृजन, और विदेशी मुद्रा बचत के लिए भी लाभदायक सिद्ध होगा।
आईआईटी बॉम्बे और महाराष्ट्र सरकार की अगली योजना है कि टैडम सोलर सेल की मदद से ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन शुरू करना। यह हाइड्रोजन, जल को विद्युत अपघटन (Electrolysis) के जरिए अलग करके बनाया जाता है। अगर यह प्रक्रिया सौर ऊर्जा से हो, तो यह पूरी तरह स्वच्छ और कार्बन-रहित होता है। ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग गाड़ियों में ईंधन, स्टील फैक्ट्रियों, रसायन उद्योग, और विद्युत उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
पेरोव्स्काइट सोलर सेल की एक प्रमुख समस्या रही है उसकी कम उम्र। लेकिन आईआईटी बॉम्बे की टीम ने इसे कम से कम 10 साल तक टिकाऊ बना दिया है। यह जलवायु परिवर्तन, वर्षा, धूप और धूल के प्रभाव को सहने में सक्षम है। साथ ही इसकी देखभाल और मरम्मत की लागत भी बेहद कम है।
आईआईटी बॉम्बे की टीम, महाराष्ट्र सरकार और एक स्टार्टअप "आर्ट-पीवी इंडिया" इस तकनीक को बाजार में लाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। योजना के अनुसार, दिसंबर 2027 तक यह तकनीक व्यावसायिक रूप से उपलब्ध हो जाएगा। भारत ही नहीं, बल्कि अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे विकासशील देशों के लिए भी यह बेहद उपयोगी सिद्ध होगा।
सौर ऊर्जा का प्रयोग पहले से ही कार्बन उत्सर्जन को घटाने में सहायक रहा है, लेकिन टैडम सोलर सेल से यह प्रक्रिया और भी प्रभावशाली होगा। यह थर्मल पावर प्लांट्स पर निर्भरता कम करेगा। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाएगा और साथ ही, जलवायु परिवर्तन की रोकथाम में भी भारत की भूमिका को और मजबूत बनाएगा।
बड़े उद्योग, विशेषकर टेक्सटाइल, स्टील, सीमेंट और आईटी कंपनियाँ टैडम सोलर सेल का प्रयोग कर सकता हैं। औद्योगिक छतों पर यह तकनीक लगाए जाने से बिजली की लागत में भारी कमी आएगी। नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र (Renewable Energy Certificates) मिल सकता हैं। भारत में बनने वाले उत्पादों की ग्लोबल प्रतिस्पर्धा में वृद्धि होगी।
इस शोध ने भारत के युवाओं और विज्ञान छात्रों को प्रेरित किया है। टैडम सोलर सेल एक जीवंत उदाहरण है कि भारतीय संस्थान वैश्विक स्तर पर नेतृत्व कर सकता है। यह छात्रों को अनुसंधान, नवाचार और स्टार्टअप के लिए प्रोत्साहित करेगा और आईआईटी बॉम्बे एक बार फिर तकनीकी नेतृत्व में अग्रणी सिद्ध हुआ है।
सरकार को चाहिए कि इस तकनीक को प्रोत्साहन, सब्सिडी, और तेजी से लाइसेंसिंग दे। नेट मीटरिंग, सोलर टैक्स क्रेडिट, और ग्रीन एनर्जी इंसेंटिव्स को बढ़ावा दे। इससे भारत के हर नागरिक को स्वच्छ, सस्ती और टिकाऊ ऊर्जा उपलब्ध कराया जा सकेगा।
टैडम सोलर सेल न केवल तकनीकी दृष्टि से वरदान है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय क्रांति का भी माध्यम है। आने वाले वर्षों में हर घर की छत पर सोलर पैनल होगा। हर गांव स्वनिर्भर बिजली उत्पादक बन सकेगा और भारत ऊर्जा आयातक नहीं, ऊर्जा निर्यातक बनेगा।
आईआईटी बॉम्बे की यह खोज केवल एक तकनीकी आविष्कार नहीं है, यह भारत के भविष्य को सशक्त, आत्मनिर्भर और पर्यावरण के प्रति सजग बनाने की दिशा में एक विशाल कदम है। सूरज से ऊर्जा लेकर, एक-एक घर तक उजाला पहुँचाने का यह सपना अब और दूर नहीं है।
