पटना शहर में बढ़ते ध्वनि प्रदूषण को देखते हुए बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद् ने एक सराहनीय पहल की है, वह है हर रविवार को ‘नो हॉर्न डे’ मनाने की अपील।
ट्रैफिक में गाड़ियों के इंजन की आवाज, सड़क किनारे चल रहे निर्माण कार्य, और सबसे अधिक अनावश्यक हॉर्न बजाना, यह सभी ध्वनि प्रदूषण के बड़े स्रोत हैं। कई बार जल्दबाजी या आदत के कारण हॉर्न दबा देते हैं, लेकिन यह शोर आसपास के लोगों, खासकर बच्चों, बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है।
ध्वनि प्रदूषण से होने वाले मुख्य स्वास्थ्य दुष्प्रभाव है सुनने की क्षमता में कमी, नींद में बाधा, तनाव और चिड़चिड़ापन, हृदय रोगों का खतरा बढ़ना।
हर रविवार को ‘नो हॉर्न डे’ का पालन करने का अर्थ है कि कम से कम सप्ताह में एक दिन लोगों को राहत की सांस लेने का मौका देना। यह न केवल ध्वनि प्रदूषण को कम करेगा बल्कि शहरवासियों में जागरूकता भी बढ़ाएगा कि अनावश्यक हॉर्न बजाना सिर्फ शोर नहीं है, बल्कि एक सामाजिक असंवेदनशीलता है।
शहर में कई स्थान ऐसे हैं जिन्हें ‘शांत क्षेत्र’ घोषित किया गया है, जैसे- अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, अदालत और धार्मिक स्थल। इन इलाकों में हॉर्न बजाना कानूनन प्रतिबंधित है, लेकिन फिर भी कई बार नियम तोड़े जाते हैं। अगर इन क्षेत्रों के आसपास हॉर्न से बचेंगे, तो यह न केवल कानून का पालन होगा बल्कि मानवीय संवेदनशीलता का भी प्रमाण होगा।
‘नो हॉर्न डे’ सिर्फ सरकारी अपील नहीं है, बल्कि एक नागरिक कर्तव्य है। हर व्यक्ति अगर यह संकल्प ले कि रविवार को बिल्कुल भी हॉर्न नहीं बजाएंगे, बाकी दिनों में भी केवल आवश्यकता पड़ने पर ही हॉर्न का इस्तेमाल करेंगे, दूसरों को भी इस बारे में जागरूक करेंगे, तो यह पहल एक बड़े सामाजिक परिवर्तन का कारण बन सकता है।
पूरे शहर के लोग रविवार को हॉर्न न बजाएं, तो कितना सुकूनभरा वातावरण बनेगा। बच्चे खुलकर खेल सकेंगे, बुजुर्ग चैन से आराम कर सकेंगे, और मरीजों को शांति मिलेगी। इस छोटे से कदम से सभी लोग एक बड़े बदलाव का हिस्सा बन सकते हैं।
