ट्रंप टैरिफ बनाम ब्रिक्स रणनीति - वैश्विक व्यापार युद्ध की आहट और उभरती आर्थिक एकजुटता

Jitendra Kumar Sinha
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अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां महाशक्तियों के निर्णय न केवल उनके अपने देशों, बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक संरचना को प्रभावित कर रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में जिस तरह नए टैरिफ लगाया है, उसने वैश्विक व्यापार में हलचल मचा दिया है। यह कदम खासकर स्टील, एल्युमीनियम, ऑटोमोबाइल और कृषि उत्पाद जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर असर डालने वाला है।

ब्राजील के राष्ट्रपति लुईज इनासियो लूला दा सिल्वा का मानना है कि यह टैरिफ किसी एक देश के खिलाफ नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन के खिलाफ एक चुनौती है। इसलिए उन्होंने ब्रिक्स देशों के विशेष सम्मेलन का प्रस्ताव रखा है, ताकि इन नीतियों का सामूहिक रूप से सामना किया जा सके।

टैरिफ यानि आयातित वस्तुओं पर लगाया जाने वाला कर। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इन टैरिफ का उद्देश्य अमेरिकी उद्योगों और श्रमिकों की रक्षा करना है। उनके अनुसार, विदेशी कंपनियां सस्ती दरों पर सामान भेजकर अमेरिकी बाजार पर कब्जा कर रही हैं, जिससे स्थानीय उत्पादन घट रहा है और नौकरियां जा रही हैं।
लेकिन आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम "प्रोटेक्शनिज्म" की ओर एक बड़ा कदम है, जिससे मुक्त व्यापार सिद्धांत को चुनौती मिलती है। 

आज की अर्थव्यवस्था परस्पर जुड़ी हुई है। उदाहरण के लिए, एक कार बनाने के लिए अमेरिका स्टील ब्राजील से, इलेक्ट्रॉनिक चिप चीन से और डिजाइन सेवाएं भारत से ले सकता है। यदि स्टील पर भारी टैरिफ लगा दिया जाए, तो यह पूरी उत्पादन लागत बढ़ा देता है और आपूर्ति श्रृंखला में देरी का कारण बनता है।

ट्रंप टैरिफ से यूरोपीय संघ, चीन, भारत, ब्राजील और रूस जैसे देश नाराज हो सकता है। यदि वह भी जवाबी टैरिफ लगाता है, तो यह "ट्रेड वॉर" का रूप ले सकता है, जो 1930 के दशक के महामंदी काल की तरह वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकता है।

ब्रिक्स (BRICS) का गठन 2009 में हुआ था, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। यह समूह दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिनकी कुल जनसंख्या विश्व की 40% से अधिक और वैश्विक GDP में 25% हिस्सेदारी है। ब्रिक्स का उद्देश्य केवल आर्थिक सहयोग ही नहीं है, बल्कि वैश्विक मंचों पर एक संयुक्त आवाज उठाना भी है।

ब्राजील के राष्ट्रपति लूला का मानना है कि ट्रंप टैरिफ का मुकाबला अकेले करना किसी भी देश के लिए मुश्किल होगा। इसके लिए आवश्यक है कि ब्रिक्स देश एक विशेष सम्मेलन बुलाकर सामूहिक रणनीति बनाएं, जिसमें वैकल्पिक बाजार, आपसी व्यापार वृद्धि और सामूहिक दबाव नीति शामिल हो।

स्टील और कृषि उत्पादों के बड़े निर्यातक के रूप में ब्राजील पर सीधा असर होगा। अमेरिका ब्राजील के स्टील का प्रमुख आयातक है, इसलिए टैरिफ से नुकसान होगा। रूस पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। ऊर्जा निर्यात पर सीधा प्रभाव कम होगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता रूस की मुद्रा और निवेश पर असर डालेगा। अमेरिका भारत के आईटी सेवाओं, वस्त्र और कृषि उत्पादों का बड़ा बाजार है। टैरिफ से इन क्षेत्रों में निर्यात घट सकता है, जिससे रोजगार पर असर पड़ेगा। चीन पहले से ही अमेरिका के साथ टैरिफ विवाद में उलझा हुआ है। ट्रंप की नीति चीन के निर्यात को और दबाव में ला सकता है। दक्षिण अफ्रीका- खनिज और धातु निर्यात पर असर पड़ेगा, जिससे स्थानीय उद्योगों को झटका लग सकता है।

चीन पहले से ही अमेरिका के साथ व्यापारिक टकराव में है। लूला का प्रस्ताव चीन को ब्रिक्स के भीतर एक मजबूत नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का अवसर देता है। चीन के पास वैकल्पिक बाजार और निवेश के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, जो अन्य ब्रिक्स देशों को मदद कर सकता हैं।

भारत के लिए यह एक संतुलन साधने की चुनौती है। अमेरिका के साथ मजबूत आर्थिक संबंध बनाए रखना भी जरूरी है और ब्रिक्स में सामूहिक रुख अपनाना भी। भारत डिजिटल सेवाएं, फार्मास्युटिकल्स और कृषि जैसे क्षेत्रों में ब्रिक्स साझेदारी का लाभ ले सकता है।

ब्रिक्स देशों की संभावित सामूहिक रणनीतियां हो सकता है, आंतरिक व्यापार बढ़ाना- ब्रिक्स देशों के बीच शुल्क कम करके आपसी व्यापार को बढ़ावा देना। वैकल्पिक बाजार खोजना- अमेरिका पर निर्भरता कम करके अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया में नए बाजार विकसित करना। मुद्रा स्वैप समझौते-  डॉलर पर निर्भरता घटाकर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना। संयुक्त निवेश कोष- औद्योगिक विकास और तकनीकी सहयोग के लिए फंड बनाना। वैश्विक मंचों पर संयुक्त बयान-  WTO और G20 जैसे मंचों पर एकजुट होकर अमेरिका की टैरिफ नीति का विरोध करना।

ट्रंप टैरिफ केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन से भी जुड़ा है। यूरोपीय संघ, जापान और कनाडा जैसे देश भी इस पर चिंतित हैं। यदि ब्रिक्स इस मौके पर एकजुट होता है, तो यह वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को और मजबूत कर सकता है।

लूला दा सिल्वा का ब्रिक्स सम्मेलन प्रस्ताव सही समय पर आया है। ट्रंप टैरिफ के खिलाफ संयुक्त रणनीति बनाना न केवल आर्थिक हितों की रक्षा करेगा, बल्कि ब्रिक्स को एक प्रभावी वैश्विक ताकत के रूप में स्थापित करेगा। यह तभी संभव है जब सभी सदस्य देश राजनीतिक मतभेद भुलाकर एक आर्थिक मोर्चे पर एकजुट हों। यदि यह हुआ, तो ब्रिक्स न केवल इस व्यापारिक चुनौती का सामना करेगा, बल्कि आने वाले दशकों में वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।



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