भारत ने दुनिया को अनेक अमूल्य धरोहरें दी हैं, जिनमें से आयुर्वेद सबसे प्रमुख है। केंद्र सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि अब आयुर्वेद दिवस प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को मनाया जाएगा। पहले यह दिवस धन्वंतरि जयंती (धनतेरस) के दिन मनाया जाता था। इस वर्ष गोवा 10वें आयुर्वेद दिवस की मेजबानी कर रहा है, जिसका विषय है "आयुर्वेद फॉर पीपल एंड प्लानेट" (मानव और ग्रह के लिए आयुर्वेद)।
आयुर्वेद केवल उपचार की पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक पूर्ण कला है। इसमें आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और मानसिक संतुलन को उतना ही महत्व दिया गया है जितना औषधियों को। यही कारण है कि आज भी यह परंपरा भारतीय समाज की जड़ों में गहराई से बसी हुई है।
केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने अपने संदेश में कहा है कि आयुर्वेद जीवन को स्वस्थ, संतुलित और पर्यावरण के अनुकूल बनाने का मार्ग दिखाता है। यह केवल व्यक्ति की बीमारी नहीं देखता, बल्कि उसकी जीवनशैली और प्रकृति से जुड़ाव को भी समझता है।
सरकार द्वारा आयुर्वेद दिवस की तारीख में यह बदलाव गहन विचार के बाद किया गया है। इसका उद्देश्य इस दिन को किसी धार्मिक या पर्व विशेष से अलग कर एक वैश्विक चिकित्सा परंपरा के उत्सव के रूप में स्थापित करना है। 23 सितंबर को मनाए जाने से यह किसी विशेष समुदाय तक सीमित न रहकर पूरी मानवता का उत्सव बन जाएगा।
आधुनिक समय में प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और असंतुलित जीवनशैली बड़ी चुनौतियाँ बन चुकी हैं। ऐसे में आयुर्वेद का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह मनुष्य को प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीने की शिक्षा देता है। औषधियों के लिए पेड़-पौधों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की बात करता है। "सर्वे भवन्तु सुखिनः" की भावना के साथ व्यक्ति और ग्रह दोनों के कल्याण पर जोर देता है।
आज दुनिया के अनेक देश योग और आयुर्वेद को स्वास्थ्य का सशक्त विकल्प मान रहे हैं। अमेरिका, यूरोप और एशिया के कई देशों में आयुर्वेदिक उपचार और पंचकर्म थेरेपी लोकप्रिय हो रही हैं। आयुष मंत्रालय के प्रयासों से भारत इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर रहा है।
