दाक्षायनी शक्तिपीठ (देवी सती के दायाँ हाथ गिरा था)

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना


भारतीय संस्कृति में शक्तिपीठों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। देवी शक्ति के विविध रूपों की उपासना का केंद्र यह पीठ न केवल धार्मिक आस्था का आधार हैं, बल्कि इनसे जुड़ी कथाएं, पुराण प्रसंग और दार्शनिक विचार भारतीय अध्यात्म की गहराइयों को प्रकट करता है। इन्हीं शक्तिपीठों में से एक है “दाक्षायनी शक्तिपीठ”, जो तिब्बत स्थित कैलाश मानसरोवर के समीप माना जाता है। यह वह पावन स्थान है जहाँ सती माता का दायाँ हाथ गिरा था। इसकी अधिष्ठात्री शक्ति दाक्षायनी और भैरव अमर माना जाता है। 

भारतीय पुराणों के अनुसार, दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ में जब भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया और सती का अपमान हुआ, तो सती ने आत्मदाह कर लिया। यह घटना समस्त ब्रह्मांड को विचलित करने वाली थी। शिवजी शोकाकुल होकर सती के शरीर को लेकर तांडव करने लगे।

ब्रह्मांड की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड कर दिया। कहा जाता है कि जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। इन्हीं में से एक है  “दाक्षायनी शक्तिपीठ” है।

शक्तिपीठ केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं हैं, बल्कि यह उस दिव्य ऊर्जा का प्रतीक हैं, जो सृष्टि का संचालन करती है। प्रत्येक शक्तिपीठ का अपना विशेष महत्व है और उससे जुड़े भैरव की उपस्थिति इस शक्ति की रक्षा और संतुलन को बनाए रखती है।

‘दाक्षायनी’ नाम स्वयं इस शक्तिपीठ की पौराणिक कथा को उजागर करता है। ‘दक्ष’ की पुत्री होने के कारण सती का नाम दाक्षायनी था। इसी नाम से यह शक्तिपीठ प्रसिद्ध हुआ। यहाँ सती का दायाँ हाथ गिरा था।

“दाक्षायनी शक्तिपीठ” के भैरव अमर माने जाते हैं। भैरव की उपस्थिति दर्शाता है कि शक्ति और शिव का अटूट संबंध हर शक्तिपीठ में जीवित है। अमर भैरव यहां शक्ति की रक्षा और साधकों को आशीर्वाद देने वाले देवता हैं।

“दाक्षायनी शक्तिपीठ” कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के समीप स्थित है। यह स्थान तिब्बत के क्षेत्र में आता है और अपनी अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। हिमालय को ‘देवात्मा’ कहा गया है। यहाँ की ऊँची चोटियाँ, शुद्ध जल, निर्मल वायु और शांत वातावरण साधकों को गहन ध्यान और साधना का अवसर प्रदान करता है।

मानसरोवर और कैलाश की यात्रा हिन्दुओं, बौद्धों और जैनों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस यात्रा में  “दाक्षायनी शक्तिपीठ” का दर्शन साधकों की यात्रा को पूर्णता प्रदान करता है। यह शक्तिपीठ साधकों के लिए शक्ति साधना का विशेष स्थल है। यहाँ ध्यान, जप, हवन और पूजा के माध्यम से साधक आत्मिक शांति और शक्ति का अनुभव करता है।

 “दाक्षायनी शक्तिपीठ” भारत और तिब्बत की सांस्कृतिक कड़ी का प्रतीक है। भारतीय तीर्थयात्री सदियों से यहाँ आते रहे हैं और स्थानीय संस्कृति में भी इसका प्रभाव परिलक्षित होता है। स्थानीय लोगों में यह विश्वास है कि दाक्षायनी माता साधकों की हर विपत्ति से रक्षा करती हैं और अमर भैरव हर बुराई का नाश करते हैं।

कैलाश मानसरोवर यात्रा अत्यंत कठिन और साहसपूर्ण माना जाता है। ऊँचाई, मौसम और भौगोलिक चुनौतियाँ इसे कठिन बनाता है। भले ही यह यात्रा कठिन है, लेकिन श्रद्धालु अपने अटूट संकल्प और भक्ति से इस यात्रा को पूर्ण करते हैं। उनका विश्वास है कि दाक्षायनी माता की कृपा से सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं।

“दाक्षायनी शक्तिपीठ” शक्ति की उस ऊर्जा का प्रतीक है, जो सृष्टि का आधार है। साधकों का अनुभव है कि इस शक्तिपीठ के दर्शन से आत्मा को अद्वितीय शांति और ऊर्जा प्राप्त होती है।

“दाक्षायनी शक्तिपीठ” का उल्लेख विभिन्न पुराणों और तंत्र ग्रंथों में मिलता है। हालाँकि यहाँ किसी भव्य मंदिर का स्वरूप नहीं है, फिर भी इसकी पवित्र शिला और प्राकृतिक वातावरण ही साधकों के लिए सर्वोच्च मंदिर है।

आज के समय में कैलाश मानसरोवर यात्रा धार्मिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र बन चुका है। विश्वभर के साधक और शोधकर्ता यहाँ की ऊर्जा, संस्कृति और आध्यात्मिक महत्व का अध्ययन करने आते हैं।

“दाक्षायनी शक्तिपीठ” न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह शक्ति और शिव के अनंत संबंध की गाथा है। यह उस दिव्य ऊर्जा का प्रतीक है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को संचालित करती है। कैलाश और मानसरोवर की पवित्रता के साथ यह शक्तिपीठ साधकों को आत्मिक शक्ति, शांति और मुक्ति का अनुभव कराता है।



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