भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बीते कुछ दशकों में वह मुकाम हासिल किया है, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। मंगलयान से लेकर चंद्रयान और सूर्ययान तक, भारत ने यह साबित कर दिया है कि सीमित बजट में भी असंभव दिखने वाली ऊंचाइयों को छुआ जा सकता है। अब इसरो एक और ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है, तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के कुलशेखरपट्टिनम में दूसरा लॉन्च पैड।
यह प्रक्षेपण केंद्र वर्ष दिसंबर 2026 तक तैयार हो जाएगा और यहां से हर साल 20 से 25 अंतरिक्ष मिशन प्रक्षेपित करने का लक्ष्य रखा गया है। यह न केवल इसरो की क्षमता को दोगुना करेगा बल्कि भारत को वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में और मजबूत स्थिति दिलाएगा।
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम 1960 के दशक में शुरू हुआ। केरल के थुंबा से रॉकेट प्रक्षेपण की शुरुआत हुई, जहां वैज्ञानिक अपनी साइकिलों और बैलगाड़ियों में रॉकेट के पुर्जे लेकर जाते थे। वहीं से भारत ने धीरे-धीरे अपनी तकनीक विकसित की और आज दुनिया के प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों में शामिल हो गया है।
आंध्र प्रदेश का श्रीहरिकोटा (सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र) अब तक इसरो का मुख्य प्रक्षेपण स्थल रहा है। यहीं से पीएसएलवी, जीएसएलवी और अब एलवीएम3 जैसे बड़े रॉकेट लॉन्च होते हैं। लेकिन अंतरिक्ष मिशनों की संख्या बढ़ने और नए लघु प्रक्षेपण यान (एसएसएलवी) के आगमन के बाद दूसरा प्रक्षेपण स्थल आवश्यक हो गया था।
नया प्रक्षेपण परिसर 2300 एकड़ भूमि पर विकसित किया जा रहा है। यह समुद्र तटीय क्षेत्र भारत को रणनीतिक दृष्टि से भी लाभकारी साबित करेगा। इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन के अनुसार, परियोजना का काम दिसंबर 2026 तक पूरा कर लिया जाएगा। इसके बाद यहां से 20 से 25 मिशन प्रति वर्ष लॉन्च होंगे। इस परिसर के उद्घाटन और पहले मिशन प्रक्षेपण की औपचारिक घोषणा प्रधानमंत्री उचित समय पर करेंगे।
एसएसएलवी (Small Satellite Launch Vehicle) एक हल्का और तेज तैयार होने वाला रॉकेट है। इसे खासतौर पर छोटे उपग्रहों (50-500 किलोग्राम) को पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में स्थापित करने के लिए बनाया गया है। विकास लागत 170 करोड़ रुपये, प्रक्षेपण लागत 30–35 करोड़ रुपये (पीएसएलवी से 10 गुना सस्ता) तैयारी करने का समय केवल 1 सप्ताह, टीम आकार 6 इंजीनियर। पीएसएलवी को तैयार करने में 30-45 दिन लगते हैं और लगभग 600 वैज्ञानिक-इंजीनियरों की बड़ी टीम चाहिए। एसएसएलवी को केवल 6 इंजीनियर एक हफ्ते में लॉन्च के लिए तैयार कर देते हैं।
आज की दुनिया में छोटे उपग्रहों का महत्व तेजी से बढ़ा है। टेलीकॉम कंपनियां, इंटरनेट सेवाएं, मौसम पूर्वानुमान, पृथ्वी निगरानी और रक्षा क्षेत्र के लिए छोटे उपग्रहों की जरूरत पड़ती है। एसएसएलवी की खासियत है कि इसे ऑन-डिमांड यानि ग्राहकों की मांग पर जल्द तैयार करके लॉन्च किया जा सकता है। इससे भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपग्रह प्रक्षेपण के लिए सर्वश्रेष्ठ और किफायती विकल्प बनकर उभरेगा।
अमेरिका (स्पेसएक्स), रूस, यूरोप (एरियनस्पेस), चीन और जापान पहले से ही अंतरिक्ष सेवाएं प्रदान कर रहा है। लेकिन इनकी लागत अधिक है। भारत अपने किफायती और भरोसेमंद लॉन्च के कारण पहले से ही अफ्रीका, एशिया और यूरोप के कई देशों के लिए पसंदीदा साझेदार है। यह कम लागत, उच्च सफलता दर, तेजी से प्रक्षेपण, सरकारी और निजी साझेदारी का बढ़ता दायरा है।
भारत के छात्रों और वैज्ञानिकों को छोटे उपग्रह बनाने और उन्हें जल्द लॉन्च करने का अवसर मिलेगा। इससे शोध और नवाचार को प्रोत्साहन मिलेगा। एसएसएलवी की तकनीक भविष्य में रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट) की दिशा में भी योगदान करेगा। भारत अपनी सुरक्षा और रक्षा संबंधी उपग्रहों को भी जल्द और गुप्त रूप से लॉन्च कर सकेगा।
कुलशेखरपट्टिनम प्रक्षेपण केंद्र केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर भी बड़ा बदलाव लाएगा। हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र का बुनियादी ढांचा मजबूत होगा। पर्यटन और शिक्षा संस्थानों को भी इससे लाभ मिलेगा।
भारत में निजी अंतरिक्ष कंपनियां जैसे स्कायरूट, अग्निकुल और पिक्सेल पहले से सक्रिय हैं। एसएसएलवी और नया लॉन्च पैड इनके लिए भी बड़ा अवसर होगा। स्पेसएक्स जैसी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करना आसान नहीं होगा, लेकिन भारत की ताकत उसकी किफायत और विश्वसनीयता है। कुलशेखरपट्टिनम प्रक्षेपण परिसर भविष्य में न केवल छोटे उपग्रह बल्कि गहरे अंतरिक्ष अभियानों में भी सहायक होगा।
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम हमेशा से ही कम बजट में बड़े सपनों को साकार करने का उदाहरण रहा है। कुलशेखरपट्टिनम में तैयार हो रहा दूसरा लॉन्च पैड और एसएसएलवी भारत की नई महत्वाकांक्षा का प्रतीक है। यह न केवल हर साल 20-25 मिशनों को संभव बनाएगा बल्कि भारत को वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग में सबसे भरोसेमंद और किफायती साझेदार बना देगा। 2026 के बाद जब इस केंद्र से पहला मिशन लॉन्च होगा, तो यह क्षण भारत के अंतरिक्ष इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेगा।
