एनसीईआरटी ने कक्षा छठी से आठवीं तक की साइंस किताबों में आयुर्वेद को शामिल करने का फैसला लिया है। सरकार के निर्देश के बाद यह निर्णय लिया गया है और इस बदलाव का मकसद है छात्रों को भारत की हजारों साल पुरानी वैज्ञानिक परंपराओं से जोड़ना।
एनसीईआरटी निदेशक प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी ने बताया है कि यह कदम समग्र शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में है। यानि सिर्फ लैब और केमिकल्स की दुनिया नहीं है, बल्कि शरीर, प्रकृति और जीवन के बीच के रिश्तों को भी बच्चे समझें। सोचिए, बच्चे पौधों के पत्ते देखते हुए सिर्फ उनकी संरचना नहीं पढ़ेंगे, बल्कि यह भी जानेंगे कि तुलसी सिर्फ हरी पत्ती नहीं है, बल्कि सर्दी में गर्म चाय का साथी है, और सदियों से यह दादी-नानी की दवा पेटी का हिस्सा रही है।
दुनिया आज योग और आयुर्वेद से सीख रही है, स्पा से लेकर दवा उद्योग तक भारतीय जड़ी-बूटियों की चर्चा हर जगह है। तो क्यों न भारत के बच्चे भी अपने ही घर की विद्या को समझें? साइंस किताबों में आयुर्वेद के अध्याय जुड़ने से छात्र जानेंगे कि शरीर सिर्फ मशीन नहीं है, बल्कि प्रकृति की धड़कन से जुड़ा है। खानपान भी दवा है। मौसम, भोजन, दिनचर्या और स्वभाव से बीमारियाँ बनती और मिटती हैं।
नए अध्यायों में आयुर्वेद के मूल सिद्धांत शामिल होंगे। पंच तत्व और शरीर का संबंध। त्रिदोष सिद्धांत: वात, पित्त, कफ। औषधीय पौधे और उनका उपयोग। दिनचर्या और ऋतुचर्या। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के प्राकृतिक तरीके।
कुछ लोग कहेंगे कि आधुनिक विज्ञान और प्राचीन ज्ञान को मिलाना ठीक नहीं है, लेकिन असली विज्ञान वही है जो प्रयोग और अनुभव से गुजरता है। आयुर्वेद हजारों साल से भारतीय जीवन का हिस्सा है। हां, इसके साथ आधुनिक चिकित्सा का संतुलन भी जरूरी है। यह कदम बच्चों को सिर्फ जड़ से जोड़ना नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक सोच और सांस्कृतिक समझ दोनों को बढ़ाने जैसा है।
