बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में 11 नवंबर को 20 जिलों की 122 सीटों पर मतदान होना है, जिसमें लगभग 3 करोड़ 70 लाख मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इस चरण में मुकाबला केवल एनडीए और महागठबंधन के बीच नहीं, बल्कि छोटे दलों की भूमिका भी निर्णायक साबित होने वाली है। कई सीटों पर ये छोटे दल बड़े गठबंधनों के समीकरण को बदल सकते हैं।
एनडीए खेमे की बात करें तो लोक जनशक्ति पार्टी ने 28 में से 15 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के छह प्रत्याशी मैदान में हैं। वहीं रालोसपा चार सीटों पर किस्मत आजमा रही है। इन छोटे सहयोगी दलों के प्रदर्शन पर एनडीए का समग्र परिणाम काफी हद तक निर्भर करेगा।
महागठबंधन की ओर से मगध क्षेत्र पर खास ध्यान है, जहां पिछली बार उन्होंने 26 में से 20 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार कांग्रेस 61 सीटों में से 37 पर चुनाव लड़ रही है, जबकि विकासशील इंसान पार्टी सात सीटों पर मैदान में है। निषाद समाज के प्रभाव वाले इलाकों में इस पार्टी की भूमिका अहम मानी जा रही है।
क्षेत्रीय समीकरणों की बात करें तो तिरहुत इलाके में एनडीए की पकड़ मजबूत बताई जा रही है, जहां पिछली बार उसे 30 में से 23 सीटें मिली थीं। वहीं सीमांचल क्षेत्र में मुस्लिम बहुल इलाकों के कारण मुकाबला जटिल हो गया है, क्योंकि वहां एआईएमआईएम जैसे दलों की मौजूदगी से वोटों का बंटवारा संभव है।
इस चरण में मतदान का रुख तय करेगा कि सत्ता की डोर किसके हाथ में आएगी। छोटे दलों का वोट प्रतिशत और क्षेत्रीय प्रभाव कई सीटों पर बड़ा फर्क डाल सकता है। कुल मिलाकर, दूसरे चरण का चुनाव इस बार बड़े दलों की नहीं बल्कि छोटे दलों की रणनीति और प्रभाव का इम्तिहान है — जो तय करेगा कि एनडीए और महागठबंधन में से कौन बढ़त बनाएगा।
