बिहार के भागलपुर जिला में इतिहास एक बार फिर जमीन से बाहर निकलकर संसार के सामने आ खड़ा हुआ है। बिहपुर प्रखंड के जयरामपुर पंचायत स्थित गुवारीडीह टीले से लगभग 13 सौ वर्ष पुरानी भगवान विष्णु की प्रतिमा मिलने की खबर ने न केवल स्थानीय लोगों में उत्साह जगाया है, बल्कि पुरातत्व जगत में भी नई जिज्ञासाएँ उत्पन्न कर दी हैं। यह प्रतिमा अपने शिल्प, शैली और ऐतिहासिक महत्व के कारण बेहद मूल्यवान माना जा रहा है।
ठीक ही कहा गया हैं कि इतिहास मिटता नहीं है, सिर्फ छुप जाता है। ऐसा ही हुआ कोसी नदी के कटाव प्रभावित इलाके में। इस प्रतिमा को सबसे पहले स्थानीय ग्रामीण अमित कुमार उर्फ झूनो चौधरी ने कछार से बाहर निकाला। नदी के कटाव ने जहाँ कई गाँवों को निगल लिया, वहीं सदियों पुरानी यह धरोहर बाहर आ गई, मानो स्वयं इतिहास ने अपने अस्तित्व का संकेत दिया हो।
प्रतिमा भगवान विष्णु की है, जो अभय मुद्रा में दिखाई दे रहा है। यह मुद्रा दर्शाता है कि देवता अपने भक्तों को निर्भय होने का संदेश देते हैं। प्रतिमा में एक हाथ में दंड, शरीर पर जनेऊ, और नीचे कमल आसन की स्पष्ट झलक मिलती है। यद्यपि प्रतिमा खंडित है, फिर भी इसकी नक्काशी और सजीवता शिल्पकारों की उत्तम कला का परिचय देता है।
पुरातत्वविदों का अनुमान है कि यह प्रतिमा पाल काल (8वीं–9वीं शताब्दी) का हो सकता है। बिहार और बंगाल में फैला पाल साम्राज्य कला और संस्कृति के उत्कर्ष का काल माना जाता है। उस समय की मूर्तियाँ अपनी बारीक नक्काशी, सुगढ़ आकृति और धार्मिक भाव की गहराई के लिए प्रसिद्ध रही है। इस प्रतिमा में प्रयुक्त शिल्प वही विशेषताएँ दर्शाता है शांत भाव, सूक्ष्म रेखाएँ और सादगी में सौंदर्य।
घटना की जानकारी फैलते ही भागलपुर से दो शोधकर्ता मौके पर पहुँचे। उन्होंने प्रतिमा का प्रारंभिक अध्ययन किया और इसे पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। शोधकर्ताओं ने इसके संरक्षण और विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया है, ताकि इसके वास्तविक इतिहास, निर्माण तकनीक और सांस्कृतिक संदर्भ को ठीक तरीके से समझा जा सके।
गुवारीडीह के ग्रामीणों में इस खोज को लेकर काफी उत्साह है। उनका कहना है कि यह प्रतिमा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि उनके क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहर भी है। कई लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इस खोज से क्षेत्र को पुरातात्विक मानचित्र पर विशेष पहचान मिलेगा और पर्यटन की संभावनाएँ भी बढ़ेगा।
इतिहासकारों के अनुसार, अगर इस प्रतिमा का सही संरक्षण किया गया, तो यह बिहार की प्राचीन कला को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सरकार या पुरातत्व विभाग द्वारा इसे सुरक्षित स्थान पर ले जाना और वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है।
