इंसानी त्वचा से मिलती-जुलती दिखाई देती है - ‘ओल्म’ (प्रोटियस एंगुइनस)

Jitendra Kumar Sinha
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‘ओल्म’ दुनिया के सबसे रहस्यमय और अद्भुत उभयचरों में से एक है, जो मुख्य रूप से यूरोप की गहरी और अंधेरी गुफाओं में पाया जाता है। इसे “मानव मछली” भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी त्वचा हल्की गुलाबी-सफेद होती है और यह इंसानी त्वचा से कुछ हद तक मिलती-जुलती दिखाई देती है। ‘ओल्म’ का वैज्ञानिक नाम “प्रोटियस एंगुइनस” है और यह उन चुनिंदा जीवों में शामिल है, जिन्होंने लाखों वर्षों में अत्यंत कठोर परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढाल लिया है।


‘ओल्म’ पूरी तरह भूमिगत जीवन जीता है। यह ऐसी गुफाओं में रहता है, जहां सूर्य का प्रकाश बिल्कुल नहीं पहुंचता है, तापमान हमेशा ठंडा रहता है और ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम होती है। इन्हीं परिस्थितियों के कारण इसकी आंखें विकसित होकर भी काम नहीं करती है और त्वचा के नीचे ढकी रहती हैं। देखने की क्षमता के अभाव में ‘ओल्म’ ने अपनी अन्य इंद्रियों को अत्यंत संवेदनशील बना लिया है। इसकी सूंघने और सुनने की क्षमता बहुत तेज होती है, जिससे यह अंधेरे पानी में भी अपने शिकार और वातावरण को पहचान लेता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह विद्युत और रासायनिक संकेतों को भी महसूस कर सकता है।


‘ओल्म’ का शरीर लंबा, पतला और सांप जैसा होता है, जबकि इसके छोटे-छोटे पैर इसे उभयचर होने का प्रमाण देता है। यह एक अनोखा जीव है क्योंकि यह जीवनभर लार्वा अवस्था में ही रहता है। सामान्य उभयचर जैसे मेंढक या सलामेंडर समय के साथ रूपांतरण करता है, लेकिन ‘ओल्म’ कभी पूर्ण वयस्क रूप में नहीं बदलता है। इसके बावजूद यह प्रजनन करने में सक्षम होता है, जिसे विज्ञान की भाषा में निओटेनी कहा जाता है।


इस जीव की सबसे चौंकाने वाली विशेषता इसकी असाधारण दीर्घायु है। माना जाता है कि ‘ओल्म’ सौ वर्ष से भी अधिक समय तक जीवित रह सकता है। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि यह 100 से 120 वर्ष तक भी जीवित रह सकता है, जो किसी उभयचर के लिए असामान्य रूप से लंबा जीवनकाल है। इसकी धीमी चयापचय प्रक्रिया और शांत जीवनशैली इसके लंबे जीवन का मुख्य कारण माना जाता है।


‘ओल्म’ की एक और अद्भुत क्षमता है लंबे समय तक बिना भोजन के जीवित रहना। गुफाओं में भोजन की उपलब्धता बहुत कम होती है, इसलिए इसने अपने शरीर को इस तरह अनुकूलित कर लिया है कि यह कई वर्षों तक बिना खाए रह सकता है। कुछ शोधों में यह सामने आया है कि ‘ओल्म’ दस साल तक बिना भोजन के भी जीवित रह सकता है। यह अपनी ऊर्जा का अत्यंत संयमित उपयोग करता है और जरूरत पड़ने पर अपने शरीर की गतिविधियों को लगभग न्यूनतम स्तर तक घटा देता है।


आज ‘ओल्म’ वैज्ञानिकों के लिए विशेष अध्ययन का विषय है, क्योंकि यह जीव जीवन की अनुकूलन क्षमता, दीर्घायु और चरम परिस्थितियों में जीवित रहने के रहस्य सिखाता है। हालांकि, पर्यावरणीय बदलाव, जल प्रदूषण और मानवीय गतिविधियों के कारण इसका प्राकृतिक आवास खतरे में है। ‘ओल्म’ केवल एक अनोखा उभयचर ही नहीं है, बल्कि प्रकृति की अद्भुत सहनशीलता और विकासशील बुद्धिमत्ता का जीवंत उदाहरण है, जिसे संरक्षित करना मानवता की जिम्मेदारी है।



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