न्यूयॉर्क और पेंसिल्वेनिया की रैलियों का माहौल हमेशा से डोनाल्ड ट्रंप के लिए अपनी राजनीतिक कहानी गढ़ने का सबसे पसंदीदा मंच रहा है। इसी मंच पर खड़े होकर उन्होंने एक बार फिर यह कहा कि “भारत और पाकिस्तान में जंग छिड़ी हुई थी, और मैंने उसे रुकवाया।” यह कोई पहला अवसर नहीं था। ट्रंप यह दावा लगभग 70 बार दोहरा चुके हैं कि मई में भारत-पाकिस्तान के बीच जो तनाव बढ़ा था, उसे उन्होंने हस्तक्षेप करके शांत कराया। अपने समर्थकों के सामने यह बयान देते हुए ट्रंप ने यह भी जोड़ा कि “मेरे कार्यकाल के दस महीनों में मैंने आठ युद्ध खत्म करवाए।”
ट्रंप की राजनीति को जानने वाले यह भलीभांति समझते हैं कि वे अक्सर बड़े दावे और अतिशयोक्तिपूर्ण वाक्य शैली के लिए मशहूर हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि इसके पीछे की सच्चाई क्या है? क्या वास्तव में भारत और पाकिस्तान युद्ध की स्थिति में थे? क्या अमेरिकी हस्तक्षेप से स्थितियाँ बदलीं? या यह महज राजनीतिक भाषणों में बेचा जाने वाला ‘अमेरिकी उद्धारक’ आख्यान है?
मई का महीना भारत-पाकिस्तान संबंधों में हमेशा किसी न किसी तनाव की याद लेकर आता है। पुलवामा और बालाकोट की घटनाएँ ताजा थीं। 2020 और 2021 के बाद भी कई बार नियंत्रण रेखा पर झड़पें हुईं। दोनों देशों के बीच ‘थोड़ी सी चिंगारी’ भी बड़ा रूप ले सकता है, यह बात न तो भारत छिपाता है, न पाकिस्तान। लेकिन वह अवधि जिसमें ट्रंप दावा करते हैं कि “जंग छिड़ी हुई थी,” उसे देखें तो सीमा पर गोलीबारी हुई थी। कूटनीतिक बयानबाजी तेज थी। पाकिस्तान अपने भीतर की राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। भारत चीन के साथ LAC पर पहले से ही तनाव में था। अमेरिकी प्रशासन अफगानिस्तान से अपनी वापसी की योजना में उलझा था। लेकिन क्या इसे “युद्ध छिड़ना” कहा जा सकता है? सैन्य वैज्ञानिक और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ इसे आम तौर पर ‘एस्केलेशन एपिसोड’ कहते हैं, पूर्ण युद्ध नहीं। ट्रंप का दावा कि “दोनों देश परमाणु हथियारों के मुहाने पर थे”। एक अतिरंजना कही जा सकती है, लेकिन क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में इस वाक्य का असर बड़ा है, खासकर अमेरिकी राजनीति में।
ट्रंप की राजनीतिक शैली चार बातों पर चलती है अतिशयोक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा को केंद्र में रखना, खुद को ‘समाधानकर्ता’ के रूप में प्रस्तुत करना और अमेरिका की वैश्विक शक्ति को बढ़ा–चढ़ाकर दिखाना। भारत–पाकिस्तान का मुद्दा इन चारों बिंदुओं को एकसाथ जोड़ता है। एक ओर अमेरिका में दक्षिण एशियाई प्रवासी बड़ी आबादी रखते हैं, दूसरी ओर यह हमेशा वैश्विक रणनीति का संवेदनशील क्षेत्र रहा है। ट्रंप अपने भाषणों में यह बताने का प्रयास करते हैं कि दुनिया में जब भी कोई संकट आता है, जब भी युद्ध की स्थिति बनती है, जब भी परमाणु देशों के बीच टकराव की नौबत आती है तो अमेरिका के राष्ट्रपति यानि वे स्वयं उसका समाधान कर देते हैं। यह छवि चुनावों में उन्हें ‘मजबूत नेता’ का टैग दिलाती है। यह उनकी ब्रांडिंग का हिस्सा है। भारत और पाकिस्तान का नाम इसलिए भी असरदार है क्योंकि दोनों देशों की संयुक्त आबादी 1.7 अरब से अधिक है, और ट्रंप यह संदेश देना चाहते हैं कि इतनी बड़ी आबादी वाले दो परमाणु देशों के बीच संघर्ष को वे स्वयं काबू में लाए।
यह समझना आवश्यक है कि अमेरिका दक्षिण एशिया में कभी निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं रहा। दशकों तक पाकिस्तान अमेरिकी नीति का ‘सामरिक सहयोगी’ रहा है। 1950–60 के दशक में SEATO और CENTO, 1980 का दशक में सोवियत-अफगान युद्ध, 2000-2020 में आतंकवाद विरोधी अभियान, अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य सहायता भी दी और राजनीतिक समर्थन भी। 21वीं सदी में भारत-अमेरिका संबंधों में अभूतपूर्व सुधार आया, खासकर 2008 का परमाणु समझौता, रक्षा सहयोग, इंडो-पैसिफिक रणनीति, चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर अमेरिका का भारत पर भरोसा, लेकिन अमेरिका यह भी जानता है कि भारत युद्ध नहीं चाहता है। इसलिए ट्रंप का यह दावा कि उन्होंने युद्ध रोक दिया। अमेरिकी संदर्भ में राजनीतिक रूप से आकर्षक भले हो, लेकिन वास्तविकता में यह कूटनीतिक जटिलताओं का सरलीकरण है।
भारत ने हमेशा यह स्पष्ट कहा है कि “भारत-पाकिस्तान मुद्दे द्विपक्षीय हैं, किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को हम स्वीकार नहीं करते।” इस नीति की नींव 1972 के शिमला समझौते और 1999 के लाहौर घोषणा पत्र में है।
जब भी ट्रंप ने यह दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे ‘मध्यस्थता’ का अनुरोध किया, भारत सरकार ने तत्काल इसका खंडन किया। यहां तक कि संसद में भी कई बार विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने कभी मध्यस्थता नहीं मांगी। अमेरिका या किसी और को कोई औपचारिक भूमिका नहीं दी गई। सीमा पर तनाव का समाधान दोनों देश स्वयं करते हैं। ट्रंप ने यह बात स्वीकार नहीं की, क्योंकि उनका बयान अमेरिकी राजनीति के लिए था, भारतीय कूटनीति के लिए नहीं।
पाकिस्तान हमेशा से चाहता है कि अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र, OIC या कोई भी अंतरराष्ट्रीय शक्ति कश्मीर और भारत–पाक तनाव में मध्यस्थ की भूमिका निभाए। इमरान खान के कार्यकाल में यह इच्छा और भी बढ़ गई थी क्योंकि पाकिस्तान आर्थिक संकट, FATF की निगरानी और घरेलू अस्थिरता से जूझ रहा था।
ट्रंप का बयान पाकिस्तान के लिए एक राजनीतिक अवसर बन जाता है कि वे इसे अपनी ‘कामयाबी’ की तरह प्रस्तुत करते हैं कि “देखिए, अमेरिका भी मानता है कि भारत और पाकिस्तान युद्ध के कगार पर थे।” लेकिन भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी पाकिस्तान की अपेक्षा से अधिक मजबूत है, इसलिए वास्तविक नीतिगत प्रभाव सीमित ही होता है।
जब भी ट्रंप कहते हैं कि “जंग छिड़ी थी”, विशेषज्ञ यह मानते हैं कि वे जिस स्थिति का हवाला देते हैं, वह पुलवामा-बालाकोट-एयर डॉगफाइट का समय था। 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में CRPF के काफिले पर बड़ा आतंकी हमला। 26 फरवरी को भारत ने बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण कैंप पर एयर स्ट्राइक की। 27 फरवरी को पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई में भारतीय क्षेत्रों को लक्ष्य बनाया, और दोनों देशों के लड़ाकू विमानों की डॉगफाइट हुई। तनाव चरम पर पहुँच गया, दोनों देशों ने अपने-अपने फ्रंटलाइन एयरबेस सक्रिय कर दिए। पाकिस्तान ने भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान को पकड़ लिया, जिससे मामला और गंभीर हो गया। इस दौरान अमेरिका, सऊदी अरब और यूएई ने पर्दे के पीछे संपर्क बनाए। यह एक कूटनीतिक सत्य है। लेकिन क्या अमेरिका ने यह युद्ध रोक दिया?
भारत पूर्ण युद्ध का पक्षधर नहीं था। पाकिस्तान आर्थिक रूप से युद्ध की स्थिति में नहीं था। अंतरराष्ट्रीय दबाव दोनों देशों पर था। अमेरिका ने सिर्फ तनाव कम करने की सलाह दी थी, आदेश नहीं दिया था। युद्ध रोकने का श्रेय किसी एक देश या एक नेता को नहीं दिया जा सकता, इसलिए ट्रंप का “मैंने युद्ध रुकवाया” बयान एक राजनीतिक अतिशयोक्ति ही माना जाता है।
अमेरिका ने दक्षिण एशिया की नीतियों में हमेशा बैक-चैनल डिप्लोमेसी का उपयोग किया है। ट्रंप प्रशासन ने भारत और पाकिस्तान दोनों से संपर्क किया था, लेकिन यह हस्तक्षेप नहीं था, बल्कि सुरक्षा के लिहाज़ से मानक कूटनीतिक प्रक्रिया थी।
अफगानिस्तान से सुरक्षित वापसी उस समय अमेरिका तालिबान से बातचीत में व्यस्त था। पाकिस्तान के सहयोग के बिना यह संभव नहीं था। न्यूक्लियर एस्केलेशन रोकना, भारत और पाकिस्तान विश्व के सबसे खतरनाक परमाणु पड़ोसी माने जाते हैं। अमेरिका किसी भी हालत में एस्केलेशन नहीं चाहता था। चीन की बढ़त को संतुलित करना, भारत को अस्थिर नहीं होने देना अमेरिका की रणनीति का मूल है। इसलिए अमेरिका ने फोन कॉल किया, बयान जारी किया, भारत-पाक को संयम बरतने को कहा, लेकिन यह कहना कि युद्ध मैंने रुकवाया-कूटनीति का सरलीकरण है।
भारत बार-बार अमेरिका के इस दावे की पृष्ठभूमि में दो बातें स्पष्ट करता रहा है कि भारत ने बालाकोट स्ट्राइक करने का निर्णय भी स्वतंत्र रूप से लिया था। अभिनंदन की रिहाई के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय आदेश नहीं दिया गया पाकिस्तान ने स्वयं तनाव कम करने के लिए कदम उठाया। भारत यह जानता है कि युद्ध से अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ता है। चीन को लाभ मिलता है। पाकिस्तान का आतंकी तंत्र जस्टिफाई होने लगता है। वैश्विक मंचों पर भारत की छवि प्रभावित होती है, इसलिए युद्ध न करने का फैसला भारत का था, ट्रंप का नहीं।
इमरान खान और पाकिस्तान की सेना अक्सर अंतरराष्ट्रीयकरण की राजनीति खेलते रहे हैं। ट्रंप के दावे पाकिस्तान के लिए इसलिए उपयोगी हैं क्योंकि वे यह दिखा सकते हैं कि “अंतरराष्ट्रीय समुदाय हमारे साथ है।” भारत की कूटनीतिक जीत का संतुलन साधने का यह प्रयास होता है। अपने देश के भीतर “हम अकेले नहीं हैं” का नैरेटिव फैलाया जाता है। कश्मीर मुद्दे को वैश्विक महत्त्व देने का यह एक माध्यम बन जाता है। लेकिन इससे जमीनी सच्चाई नहीं बदलती है, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति कहीं अधिक मजबूत है।
ट्रंप ने कहा कि “दस महीनों में मैंने आठ युद्ध खत्म करवाए।” यह दावा भी काफी सवालों में है। अमेरिकी विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका ने किसी भी देश में औपचारिक युद्ध समाप्त नहीं किए। अफगानिस्तान से वापसी ट्रंप के समय में तय हुई, लेकिन पूरी हुई बाइडेन के समय। सीरिया, लीबिया, सोमालिया में अमेरिकी सैन्य गतिविधियाँ जारी रहीं। ईरान-अमेरिका तनाव चरम पर था (जनरल सोलैimani की हत्या)। इसलिए “आठ युद्ध खत्म करवाना” अमेरिकी मीडिया में अक्सर एक हाइपरबोलिक स्टेटमेंट के रूप में देखा जाता है।
ट्रंप की विदेश नीति तीन वाक्यों में समझी जा सकती है बड़े दावे करना, खुद को दुनिया का संकटमोचक बताना, राजनीतिक समर्थकों को सरल और आकर्षक कहानी सुनाना। भारत-पाकिस्तान तनाव इसके लिए उनकी सबसे पसंदीदा कथा बन गया। लेकिन विदेश नीति ‘रैली के भाषणों’ से नहीं चलती है। यह चलती है दस्तावेज़ों, कूटनीतिक नोट्स, सैन्य आकलन और वास्तविक जमीनी कार्रवाई के आधार पर। इनमें से किसी में भी यह नहीं मिलता है कि ट्रंप ने युद्ध रोका था। हाँ, यह मिलता है कि उन्होंने तनाव कम करने के लिए सलाह दी थी।
कूटनीतिक दृष्टि से यह बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न है। लेकिन उत्तर है “नहीं, यदि भारत युद्ध करने का निर्णय ले लेता, तो अमेरिका उसे नहीं रोक सकता था।” इसके पीछे कारण है भारत एक स्वतंत्र और शक्तिशाली राष्ट्र है। भारत का सैन्य, आर्थिक और वैश्विक स्टैंड अमेरिका पर निर्भर नहीं है । भारत-अमेरिका साझेदारी बराबरी की है, अधीनस्थ की नहीं। पाकिस्तान की तरह भारत अमेरिकी शर्तों पर नहीं चलता है। अमेरिका दबाव बना सकता था, सलाह दे सकता था लेकिन रोक नहीं सकता था। इसलिए ट्रंप का दावा वस्तुतः एक राजनीतिक कथा है, कूटनीतिक सत्य नहीं।
