आभा सिन्हा, पटना
मिथिला एक ऐसा भूभाग है जो केवल एक सांस्कृतिक क्षेत्र भर नहीं है, बल्कि भारतीय सभ्यता, ज्ञान, आस्था और दर्शन का जीवंत उद्गम स्थल माना जाता है। इसी धरा पर जन्मी विदुषी माता जानकी, इसी धरा पर फूटा विदेहों का ज्ञान, और इसी धरती पर अवतरित हुआ अनेक ऋषियों का वाङ्मय। इसी पवित्र प्रदेश की गोद में, भारत-नेपाल सीमा पर स्थित है “उमा (महादेवी) शक्तिपीठ”, जिसे माता सती के उन 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है जहाँ देवी सती का अंग पृथ्वी पर अवतरित हुआ था।
जनश्रुति के अनुसार, यहाँ देवी सती का बायाँ स्कंध (कंधा) गिरा था। इसलिए यहाँ की शक्ति को उमा तथा भैरव को महोदर कहा जाता है। यह स्थान आज भी आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है, ऐसा माना जाता है कि यहाँ साधना, जप या ध्यान तुरंत फल देता है।
भारतवर्ष में फैले 51 शक्तिपीठों की उत्पत्ति की कथा जितनी मार्मिक है, उतनी ही आध्यात्मिक भी। दक्ष प्रजापति ने यज्ञ आयोजित किया, जिसमें शिव का अपमान किया गया। सती ने पिता का अपमान सहन न कर पाने पर यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया। जब भगवान शिव को यह दुखद समाचार मिला, तो वे शोक और क्रोध में विकल होकर सती के दग्ध शरीर को लेकर तांडव करने लगे। तांडव से ब्रह्मांड संकट में पड़ गया। विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया। जहाँ-जहाँ सती के अंग, आभूषण या रक्तबिंदु गिरा, वह स्थान शक्तिपीठ कहलाया। इन्हीं 51 स्थानों में से एक है “उमा (महादेवी) शक्तिपीठ”, जहाँ देवी का बायाँ स्कंध गिरा। इस कारण यह स्थान अद्वितीय शक्ति से परिपूर्ण माना जाता है।
यह शक्तिपीठ भारत और नेपाल की सीमा पर स्थित है, जनकपुर (नेपाल) तथा मधुबनी-सीतामढ़ी क्षेत्र (भारत) के सांस्कृतिक मिलन बिंदु पर। निकटतम प्रमुख स्थान जनकपुर रेलवे स्टेशन (नेपाल) और भारत की ओर से जयनगर, मधुबनी से जुड़ा क्षेत्र है। मिथिला की यह सीमा आज भी विभाजन को नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता को दर्शाती है। यहाँ दोनों देशों के लोग समान रूप से इस शक्तिपीठ में पूजा करने आते हैं। यह वही जनकपुर है जहाँ राजा जनक का राज्य था, माता सीता का मायका था और राम-सीता विवाह का पावन स्थल भी। उसी शहर के निकट स्थित है उमा शक्तिपीठ, जिससे यह क्षेत्र और अधिक पवित्र माना जाता है।
‘उमा’ पार्वती का ही एक नाम है। शास्त्रों में बताया गया है कि तपस्या करते समय हिमवान और मेना ने उन्हें कहा “उ मा” अर्थात तप मत करो, पुत्री। तभी उनका नाम उमा पड़ा। यहाँ देवी अत्यंत शांत, सौम्य, मातृरूप में प्रतिष्ठित हैं। कहा जाता है कि यहाँ देवी का स्वरूप ममत्व और करुणा से परिपूर्ण है। भक्तों की मनोकामनाएँ अत्यंत शीघ्र पूर्ण होती हैं।
शक्ति के साथ भैरव की स्थापना अनिवार्य है। यहाँ के भैरव को महोदर कहा गया है। ‘महोदर’ का अर्थ है वह जो बड़े उदर में समस्त जगत को धारण करता है। यह शिव के अनंत महाकाल रूप का संकेत है। शक्तिपीठों में भैरव रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं
मिथिला में शक्ति उपासना अत्यंत प्राचीन है। यहाँ दुर्गा, काली, तारा, भुवनेश्वरी और चंडी जैसे देवी रूपों की पूजा वैदिक काल से प्रचलित रही है। “उमा शक्तिपीठ” इन्हीं शक्तिस्थलों की श्रेणी में एक अत्यंत प्राचीन स्थल है, जिसके बारे में लोकपरंपरा में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं।
जनकपुर को केवल राम–सीता ही नहीं, बल्कि शक्ति उपासना का भी केंद्र माना जाता रहा है। कहा जाता है कि जनक वंश के राजाओं ने इस शक्तिपीठ का संरक्षण किया था। मध्यकाल में तंत्र साधकों ने, कापालिकों ने
और नाथ संप्रदाय के योगियों ने इस स्थान को एक तांत्रिक शक्ति–केंद्र के रूप में स्थापित किया। सीमा पर स्थित होने के कारण इस स्थान में कई बार अव्यवस्थाएँ हुईं, लेकिन बीते दशकों में स्थानीय लोगों, नेपाल सरकार तथा भारतीय श्रद्धालुओं ने मिलकर इस स्थान को पुनः विकसित किया है।
यह मंदिर भव्य तो नहीं है, लेकिन अत्यंत पवित्र और ऊर्जा से भरपूर माना जाता है। मिट्टी, पत्थर और लकड़ी की पारंपरिक मिथिला वास्तुकला, ऊँचे चबूतरे पर बना गर्भगृह, प्रवेश द्वार पर तांत्रिक प्रतीकों की नक्काशी, मंदिर परिसर में पारंपरिक मैथिल चित्रकला की झलक देखने को मिलता है। गर्भगृह में देवी उमा की प्रतिष्ठित प्रतिमा, उनके चारों ओर दीपों की पंक्तियाँ और भैरव महोदर का छोटा मंदिर है। यहाँ दीवारों पर प्रतीकात्मक चित्र त्रिशूल, षड्चक्र, ॐ, त्रिपुंडरों से मंदिर का आंतरिक वातावरण अत्यंत तांत्रिक एवं दिव्य प्रतीत होता है।
भक्तों के अनुसार यहाँ विवाह सम्बन्ध की बाधाएँ दूर होती हैं। मानसिक तनाव, भय और बाधाएँ समाप्त होती हैं। व्यवसाय और आजीविका में उन्नति होती है। संतान प्राप्ति की कामना पूर्ण होती है। चैत-नवरात्र और शारदीय नवरात्र में तांत्रिक साधक विशेष अनुष्ठान करने आते हैं। यहाँ त्रिपुरा और महामाया की विशेष साधना का प्रचलन है। मिथिला में एक कहावत प्रचलित है कि “उमा के द्वार, खाली न लौटे कोई संहार।” अर्थात यहाँ आने वाला कोई भी व्यक्ति निराश नहीं लौटता है।
यहाँ नवरात्र के समय 9 दिनों तक विशेष पूजन, देवी के 9 रूपों की आराधना, कन्या पूजन, महाआरती और भंडारा होता है। इन दिनों लाखों भक्त आते हैं। जनकपुर में आयोजित विवाह पंचमी का विशेष महत्व है। उसी अवसर पर उमा शक्तिपीठ में विशेष शक्ति-पूजन और जनक-कुल द्वारा किया जाने वाला परंपरागत सम्मान का आयोजन होता है। दीपावली के समय यहाँ विशेष रूप से कात्यायनी पूजन, लक्ष्मी साधना और दीपदान किया जाता है।
मधुबनी पेंटिंग में उमा-पार्वती, शक्ति और देवी-साधना के चित्र सैकड़ों वर्षों से अंकित होते आ रहा है। यह शक्तिपीठ उन चित्रों की जीवंत प्रेरणा है। मिथिला के सोहर, भजन, कजरी, विदा गीतों में उमा का उल्लेख मिलता है। कन्याओं की भलाई के लिए माताएँ उमा का आशीर्वाद माँगती हैं। मिथिला में स्त्री को ज्ञान, शक्ति, शील एवं सृजन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। “उमा शक्तिपीठ” इस सामाजिक विचार को और अधिक गहराई देता है।
भारत-नेपाल के बीच सांस्कृतिक एकता का सबसे बड़ा केंद्र जनकपुर और मिथिला रहा है। नेपाल के लोग इसे राष्ट्रीय शक्ति-धाम मानते हैं और भारत के लोग इसे मिथिला शक्तिपीठ। यह शक्तिपीठ सीमा के इतने नजदीक है कि दिनभर दोनों देशों के लोग मिलकर पूजा करते हैं। कई परिवारों के विवाह संस्कार भी यहीं संपन्न होते हैं। यह क्षेत्र हिन्दू-बौद्ध-आदिवासी संस्कृति का मिलन बिंदु भी है।
कई भक्तों का कहना है कि यहाँ ध्यान करते ही मन स्थिर हो जाता है। चिंता और तनाव दूर हो जाते हैं। अनुभवी साधक बताते हैं कि यह स्थान कुंडलिनी जागरण के लिए विशेष ऊर्जा प्रदान करता है।
धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि “जहाँ देवी का अंग गिरा, वहाँ पृथ्वी की ऊर्जा सबसे गहन होती है।” आधुनिक विद्वान इसे भू-चुंबकीय ऊर्जा का केंद्र, प्राकृतिक ले लाइन अथवा सकारात्मक वाइबरेशन पॉकेट बताना पसंद करते हैं।
उमा स्त्री के शक्ति-स्वरूप का प्रतीक हैं। उनका संदेश है कि “स्त्री को सम्मान दो, समाज का निर्माण स्वतः सुधरेगा।” मिथिला परंपरा में देवी और प्रकृति का गहरा संबंध रहा है। पवित्र भूमि प्रकृति संरक्षण का सन्देश देती है। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित यह शक्तिपीठ बताता है कि संस्कृति की कोई सीमा नहीं होती है।
“उमा (महादेवी) शक्तिपीठ” केवल एक तीर्थ नहीं है बल्कि यह मिथिला की आत्मा, भारत–नेपाल की एकता, स्त्री शक्ति का सम्मान और ईश्वरीय ऊर्जा का अवतरण स्थल है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति मन में शांति, जीवन में संतुलन और आत्मा में नई ऊर्जा लेकर लौटता है।
