मुश्किल रास्तों की आसान सवारी है - “इलेक्ट्रिक ट्राइक”

Jitendra Kumar Sinha
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बेंगलूरु जैसे महानगर में, जहाँ तकनीक और नवाचार सांसों की तरह घुले-मिले हैं, वहीं एक स्टार्टअप ने देश की डिलीवरी व्यवस्था और माइक्रो उद्यमिता की ज़मीनी हकीकत को समझते हुए एक ऐसा समाधान तैयार किया है, जो केवल एक वाहन नहीं बल्कि रोजी-रोटी से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए उम्मीद का साधन बनता जा रहा है। 

भारत में डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है। ऑनलाइन खरीदारी, क्विक कॉमर्स, लोकल डिलीवरी और माइक्रो-एंटरप्रेन्योरशिप ने इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी है खराब सड़कें, संकरी गलियां, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और असुरक्षित दोपहिया वाहन। 

ग्रामीण इलाकों, छोटे कस्बों, पहाड़ी क्षेत्रों और शहरी स्लम बस्तियों में डिलीवरी करना आज भी एक कठिन काम है। सामान्य बाइक या स्कूटर इन रास्तों पर या तो फिसल जाता है या दुर्घटना का शिकार हो जाता है। यही वह समस्या थी, जिसने बेंगलूरु के एक स्टार्टअप को कुछ अलग सोचने के लिए मजबूर किया। इसी सोच से जन्म हुआ “इलेक्ट्रिक ट्राइक”।

बेंगलूरु को भारत की स्टार्टअप कैपिटल यूं ही नहीं कहा जाता है। यहां तकनीक सिर्फ ऐप्स और सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी समस्याओं के समाधान के रूप में सामने आती है। आइगोवाइज मोबिलिटी (iGowise Mobility) इसी सोच का उदाहरण है, एक ऐसा स्टार्टअप जिसने सड़क, सुरक्षा और सस्टेनेबिलिटी तीनों को ध्यान में रखकर एक अनोखा इलेक्ट्रिक वाहन विकसित किया है।

“इलेक्ट्रिक ट्राइक” एक तीन पहियों वाला इलेक्ट्रिक वाहन है, जिसे विशेष रूप से खराब और ऊबड़-खाबड़ सड़कों, संकरी गलियों, ग्रामीण एव अर्ध-शहरी क्षेत्रों और भारी सामान के साथ सुरक्षित डिलीवरी को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। यह न तो पारंपरिक बाइक है और न ही भारी थ्री-व्हीलर ऑटो। यह इन दोनों के बीच का एक स्मार्ट समाधान है।

दो पहियों की सबसे बड़ी कमजोरी होती है असंतुलन। खासतौर पर तब, जब सड़क गीली हो, सड़क पर गड्ढे हो और वजन पीछे ज्यादा हो। “इलेक्ट्रिक ट्राइक” में तीन पहिये होने से वाहन का संतुलन कई गुना बढ़ जाता है। इससे फिसलने और गिरने का खतरा कम होता है। ट्राइक का डिजाइन ऐसा है कि इसका वजन नीचे की ओर केंद्रित रहता है, जिससे मोड़ पर वाहन पलटने का खतरा कम होता है और भारी लोड के बावजूद स्थिरता बनी रहती है

भारत में डिलीवरी वर्कर्स सड़क हादसों के सबसे बड़े शिकार होते हैं। आइगोवाइज मोबिलिटी ने इस समस्या को गंभीरता से लिया है। “इलेक्ट्रिक ट्राइक” के मुख्य सेफ्टी फीचर्स है मजबूत मेटल फ्रेम, बेहतर ग्रिप वाले चौड़े टायर, एंटी-स्किड डिजाइन, संतुलित ब्रेकिंग सिस्टम, बारिश और कीचड़ में भी स्थिर संचालन। यह वाहन उन लोगों के लिए बनाया गया है, जो दिन में 8-10 घंटे सड़कों पर रहते हैं।

डिलीवरी सिर्फ समय पर सामान पहुंचाने का काम नहीं होता है। यह शारीरिक रूप से थकाने वाला पेशा भी है। “इलेक्ट्रिक ट्राइक” में आराम के तत्व है आरामदायक सीट, सीधी बैठने की मुद्रा, कम कंपन (Low Vibration) और भारी सामान ढोने में शरीर पर कम दबाव। इसका सीधा असर डिलीवरी वर्कर की सेहत और उत्पादकता पर पड़ता है।

“इलेक्ट्रिक ट्राइक” सिर्फ डिलीवरी बॉय के लिए नहीं है, बल्कि उन छोटे उद्यमियों के लिए भी है जो किराना डिलीवरी, दूध और सब्ज़ी सप्लाई, लोकल ई-कॉमर्स, मोबाइल स्टॉल और फूड डिलीवरी जैसे काम खुद करना चाहते हैं। इसमें पेट्रोल-डीजल की बचत होती है, मेंटेनेंस कम होता है, इलेक्ट्रिक चार्जिंग सस्ती होती है और रोजाना आय में बढ़ोतरी होती है। 

भारत की बड़ी आबादी आज भी ऐसी सड़कों पर रहती है जहां गड्ढे आम बात होती हैं, बारिश में सड़क गायब हो जाती है और संकरी गलियां हैं। वहां “इलेक्ट्रिक ट्राइक” की ग्राउंड क्लीयरेंस और व्हील डिजाइन इसे इन परिस्थितियों के लिए आदर्श बनाता है।

तेलंगाना के वारंगल जिला से आने वाले 37 वर्षीय श्रवण कुमार एक तकनीकी पृष्ठभूमि से आते हैं। उनका पढ़ाई IIIT इलाहाबाद और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (ISB) से हुआ है। उनका अनुभव टेक्नोलॉजी, बिजनेस मैनेजमेंट और प्रोडक्ट डिजाइन में है। श्रवण कुमार ने देखा है कि भारत में टेक्नोलॉजी तो बहुत है, लेकिन जमीनी समस्याओं पर कम काम होता है। उन्होंने डिलीवरी वर्कर्स से बात की, उनकी दिक्कतें समझीं और महसूस किया कि समस्या वाहन की डिजाइन में है। यहीं से आइडिया जन्मा कि एक ऐसा वाहन, जो इंसान के लिए बने, सिर्फ मशीन के लिए नहीं।

कई डिलीवरी वर्कर्स ने बताया है कि बाइक पर भारी वजन से कमर दर्द, बारिश में फिसलने का डर, रोजाना गिरने का खतरा बना रहता है। लेकिन “इलेक्ट्रिक ट्राइक” इस्तेमाल करने के बाद आत्मविश्वास बढ़ा है, थकान कम हुई है, काम के घंटे बढ़े हैं और कमाई में सुधार हुआ है। 

“इलेक्ट्रिक ट्राइक” शून्य कार्बन उत्सर्जन करता है, कम शोर करता है, ग्रीन मोबिलिटी को बढ़ावा देता है। यह भारत के EV मिशन और नेट जीरो लक्ष्य के अनुरूप है। भारत सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों पर सब्सिडी देती है, FAME योजना और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी पहलों से ऐसे स्टार्टअप को बढ़ावा दे रही है।

“इलेक्ट्रिक ट्राइक” जैसी इनोवेशन से:लास्ट-माइल डिलीवरी सस्ती होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा और माइक्रो उद्यमिता को बल मिलेगा। आइगोवाइज मोबिलिटी की आगे की योजना में अधिक रेंज वाली बैटरी, ठंडे और गर्म मौसम के लिए अलग मॉडल, ग्रामीण-विशेष संस्करण और महिला डिलीवरी वर्कर्स के लिए विशेष डिजाइन शामिल है। 

“इलेक्ट्रिक ट्राइक” का भविष्य केवल डिलीवरी तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं, मोबाइल वेंडिंग, कृषि उत्पादों की ढुलाई और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी उपयोगी हो सकता है। छोटे पैमाने पर शुरू हुआ यह विचार धीरे-धीरे एक बड़े इकोसिस्टम का हिस्सा बन सकता है, जहाँ तकनीक, रोजगार और पर्यावरण तीनों का संतुलन हो। भारत जैसे विविधता भरे देश में, जहाँ हर इलाके की जरूरत अलग है, ऐसे लचीले और व्यावहारिक समाधान ही टिकाऊ विकास की असली नींव रखता है।

आज जब देश ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ की बात करता है, तब आइगोवाइज मोबिलिटी जैसी पहल इन नारों को जमीन पर उतारती हैं। “इलेक्ट्रिक ट्राइक” केवल एक वाहन नहीं है, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जिसमें नवाचार का मकसद केवल तेजी या सुविधा नहीं, बल्कि इंसान की सुरक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता भी होता है। यही कारण है कि यह डिलीवरी वर्कर्स और माइक्रो एंटरप्रेन्योर के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और आने वाले समय में शहरी और ग्रामीण भारत की सड़कों पर इसकी मौजूदगी और भी बढ़ सकता है।



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