राजस्थान की लोकआस्था और सामूहिक भक्ति का एक अद्भुत दृश्य इन दिनों ग्राम कुहाड़ा स्थित प्रसिद्ध छापाला भैरूजी मंदिर में देखने को मिल रहा है। मंदिर के 17वें वार्षिकोत्सव और लक्खी मेले के अवसर पर पूरे क्षेत्र में उत्सव, श्रद्धा और उल्लास का वातावरण है। दूर–दराज से श्रद्धालु भैरू बाबा के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं और मंदिर परिसर भक्ति के रंग में सराबोर है।
छापाला भैरूजी मंदिर का वार्षिकोत्सव हर वर्ष ग्रामीण संस्कृति और आस्था का प्रतीक बनकर उभरता है, लेकिन इस बार आयोजन अपने विशाल स्वरूप और अनूठी व्यवस्थाओं के कारण विशेष चर्चा में है। लक्खी मेले के तहत न केवल धार्मिक अनुष्ठान हो रहे हैं, बल्कि लोक परंपराओं, मेल-जोल और सामूहिक सहभागिता की सुंदर झलक भी दिखाई दे रही है।
इस आयोजन का सबसे खास आकर्षण 651 क्विंटल चूरमे की महाप्रसादी है। खास बात यह है कि इतनी विशाल मात्रा में प्रसाद बनाने के लिए किसी भी पेशेवर हलवाई या व्यावसायिक रसोइये की मदद नहीं ली गई। गांव के पुरुष, महिलाएं और युवा, सभी ने मिलकर यह जिम्मेदारी संभाली है।
आटे, घी और गुड़ जैसी सामग्री को मिलाने के लिए तीन जेसीबी मशीनों का उपयोग किया गया है, जो अपने आप में इस आयोजन की भव्यता और सामूहिक प्रयास को दर्शाता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह महाप्रसादी केवल भोजन नहीं है, बल्कि भैरू बाबा के प्रति उनकी आस्था और समर्पण का प्रतीक है।
शुक्रवार दोपहर को मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसादी वितरित की जाएगी। इसके साथ ही पारंपरिक धमाल कार्यक्रम भी होगा, जिसमें ढोल-नगाड़ों और लोक संगीत के साथ श्रद्धालु भक्ति में सराबोर होकर नृत्य करेंगे। यह कार्यक्रम मेले की जीवंतता को और बढ़ा देगा।
मुख्य मेले के दौरान भैरू बाबा के मंदिर पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा की जाएगी। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए आस्था और उत्साह का चरम क्षण होगा। पुष्पवर्षा के साथ पूरा मंदिर परिसर “जय भैरू बाबा” के जयकारों से गूंज उठेगा।
छापाला भैरूजी मंदिर का यह आयोजन ग्रामीण एकता, लोक परंपरा और सनातन आस्था की सशक्त मिसाल बन गया है। बिना किसी औपचारिक ढांचे के, केवल श्रद्धा और सहयोग के बल पर इतना बड़ा आयोजन करना इस क्षेत्र की सामाजिक शक्ति और धार्मिक चेतना को दर्शाता है। यह महोत्सव न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि ग्रामीण संस्कृति की जीवंत पहचान भी है।
