बिहार लंबे समय से शैक्षणिक पिछड़ेपन, पलायन और संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियों से जूझता रहा है। खासकर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के छात्र-छात्राओं को आज भी बड़े शहरों की ओर रुख करना पड़ता है। इसी पृष्ठभूमि में बिहार सरकार द्वारा राज्य के 213 प्रखंडों में नए डिग्री कॉलेज खोलने की योजना न केवल एक प्रशासनिक निर्णय है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक दूरगामी कदम भी है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के स्पष्ट निर्देशों के आलोक में तैयार की गई यह योजना बिहार के उच्च शिक्षा ढांचे को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का प्रयास है। इसका उद्देश्य है ग्रामीण छात्रों को घर के पास उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए अवसरों का विस्तार करना। छात्राओं की भागीदारी बढ़ाना। पलायन पर रोक लगाना। स्थानीय स्तर पर रोजगार और बौद्धिक माहौल का निर्माण करना।
बिहार में विश्वविद्यालय और कॉलेजों का बड़ा हिस्सा जिला मुख्यालयों या शहरी क्षेत्रों में केंद्रित है। सैकड़ों प्रखंड ऐसे हैं जहां एक भी डिग्री कॉलेज नहीं है। ग्रामीण छात्रों को 30-50 किमी दूर जाना पड़ता है। परिवहन, किराया और रहने का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है। परिणाम यह होता है कि गरीब परिवारों के बच्चे 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। छात्राओं की पढ़ाई सबसे अधिक प्रभावित होता है। ड्रॉप-आउट रेट बढ़ता है और सामाजिक-आर्थिक असमानता गहराती है।
बिहार सरकार ने राज्य के उन 213 प्रखंडों की पहचान की है जहां अभी तक डिग्री कॉलेज नहीं हैं या अत्यंत अपर्याप्त हैं। इन प्रखंडों में नए सरकारी डिग्री कॉलेज स्थापित किए जाएंगे। योजना के अनुसार, प्रत्येक कॉलेज में कला (Arts), विज्ञान (Science) और वाणिज्य (Commerce) की पढ़ाई होगी। चरणबद्ध तरीके से भवन निर्माण का कार्य, शिक्षक की नियुक्ति और संबद्धता (Affiliation) की कारवाई की जाएगी। इन कॉलेजों को विश्वविद्यालयों से जोड़कर संचालन किया जाएगा।
यह योजना केवल कुछ जिलों तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग पूरे बिहार को कवर करती है। जिसमें प्रमुख है अररिया जिला के जोकीहाट, सिकटी, पलासी, नरपतगंज और भरगामा। सीमावर्ती, अल्पसंख्यक बहुल और शिक्षा में पिछड़ा क्षेत्र किशनगंज जिला के दिघलबैंक, कोचाधामन और टेढ़ागाछ। पश्चिम चंपारण जिला के पिपरासी, भीतहा, बैरिया, सिकटा, योगापट्टी और ठकराहा।
मगध और शाहाबाद क्षेत्र के अंतर्गत गया जिला के टनकुप्पा, कोंच, गुरारू, अत्री, बथानी, मोहड़ा, गुरुआ, बांके बाजार, डुमरिया और मोहनपुर। औरंगाबाद जिला के मदनपुर और ओबरा। भोजपुर जिला के अगिआंव, संदेश, सहार और चरपोखरी। रोहतास जिला के शिवसागर, रोहतास, काराकाट, संझौली और सूर्यपुरा।
मिथिलांचल क्षेत्र के अंतर्गत दरभंगा जिला के सिंहवाड़ा, तारडीह, हनुमाननगर, कुशेश्वरस्थान, कुशेश्वरस्थान पूर्वी, किरतपुर और गौड़ाबौराम। मधुबनी के खजौली, बासोपट्टी, बिस्फी, हरलाखी, फुलपरास, खुटौना और लौकही। सीतामढ़ी जिला के बाजपट्टी, बोखड़ा, चोरौत, मेजरगंज, नानपुर, परसौनी, रुन्नी सैदपुर, सोनबरसा और सुप्पी।
कोसी और सीमांचल क्षेत्र के अंतर्गत सहरसा जिला के सत्तर कटैया, नवहट्टा, सौर बाजार, पतरघट, सलखुआ और बनमा ईटहरी। मधेपुरा जिला के घैलाढ़, कुमारखंड, शंकरपुर और चौसा। पूर्णिया जिला के जलालगढ़, कृत्यानंद नगर, रुपौली, अमौर और बायसी।
उत्तर और मध्य बिहार क्षेत्र के अंतर्गत मुजफ्फरपुर जिला के औराई, बोचहां, गायघाट और मुरौल। समस्तीपुर जिला के खानपुर, कल्याणपुर, बिथान, सिंधिया और विद्यापतिनगर। वैशाली जिला के बिदुपुर, पटेढ़ी बेलसर।
इसके अतिरिक्त अरवल जिला के सूर्यपुर बंशी। बांका जिला के अमरपुर, बाराहाट, बेलहर, फुल्लीडूमर। बेगूसराय जिला के मटिहानी, बीरपुर, डंडारी, साहेबपुर कमाल, बखरी, भगवानपुर, मंसूरचक, छौड़ाही, खोदावंदपुर, गढ़पुरा, नावकोठी। भागलपुर जिला के गोराडीह, पीरपैंती, सन्हौला, गोपालपुर, इस्माइलपुर, खरीक, रंगराचौक। बक्सर जिला के ब्रह्मपुर, केसठ, चक्की, चौगाईं। पूर्वी चंपारण जिला के संग्रामपुर, मेहसी, बंजरिया, पिपराकोठी, सुगौली, तुरकौलिया, तेतरिया, पताही, फेनहारा, रामगढ़वा, आदापुर, छौड़ादानों, बनकटवा, चिरैया, गोपालगंज जिला के बैकुंठपुर, बरौली, मांझा, सिधवलिया, कटेया, पंचदेवरी, फुलवरिया, उचकागांव, विजयीपुर। जमुई जिला के खैरा, सोनो, लक्ष्मीपुर, इस्लामनगर, अलीगंज। जहानाबाद जिला के मखदुमपुर, मोदनगंज। कैमूर जिला के चैनपुर, रामपुर, नुआंव। कटिहार जिला के डंडखोरा, हसनगंज, कोदा, समेली, कुरसेला, मनसाही, अमदाबाद। खगड़िया जिला के चौथम, मानसी, बेलदौर। लखीसराय जिला के पिपरिया, हलसी, चानन, रामगढ़ चौक। मुंगेर जिला के बरियारपुर, धरहरा, टेटिया बंबर। नालंदा जिला के रहुई, नूरसराय, बिंद, नगरनौसा, कतरीसराय, थरथरी, कराइ परसुराय, परवलपुर, सरमेरा। नवादा जिला के काशीचक, अकबरपुर, गोविंदपुर, मेसकौर, रोह, सिरदला। सारण जिला के एकमा, लहलादपुर, मकेर, इसुआपुर, मढ़ौरा, मशरक, पानापुर, तरैया, दरियापुर। शेखपुरा जिला के घाटकुसंभा, चेवाड़ा, अरियरी। शिवहर जिला के डुमरी कटप्सरी, पिपराही, पुरनहिया। सीवान जिला के बसंतपुर, भगवानपुर हाट, लकड़ी नवीगंज, आंदर, दरौली, गुठनी, हसनपुरा, हुसैनगंज, नौतन, सिसवन। सुलौल जिला के किशनपुर, सरायगढ़ भपटियाही, पिपरा, छातापुर, मरौना, प्रतापगंज। शामिल है।
ग्रामीण बिहार में पढ़ाई छोड़ने की सबसे बड़ी वजह होती है सुरक्षा, दूरी और सामाजिक दबाव। इन कारणों से लड़कियां 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं। स्थानीय कॉलेज बनने से इसका प्रभाव, माता-पिता का भरोसा, घर के पास पढ़ाई, स्नातक शिक्षा में महिला भागीदारी बढ़ेगी।
हर साल लाखों छात्र पटना, दिल्ली, कोटा और लखनऊ का रुख करते हैं। ऐसी स्थिति में इस योजना से स्थानीय स्तर पर शिक्षा, आर्थिक बोझ में कमी, परिवार के साथ रहकर पढ़ाई और पलायन में आंशिक कमी आएगी। प्रत्यक्ष रूप से शिक्षक, लिपिक, पुस्तकालयाध्यक्ष और चतुर्थ वर्ग कर्मचारी को रोजगार मिलेगा। प्रत्यक्ष रूप से हॉस्टल, किराया, दुकानें, कोचिंग और स्टेशनरी संबंधित स्वरोजगार मिलेगा। यानि एक कॉलेज एक छोटा शैक्षणिक इको-सिस्टम होगा।
यह योजना चुनावी वादा नहीं है बल्कि दीर्घकालिक नीति है। नीतीश कुमार की पहचान सामाजिक न्याय, शिक्षा, समावेशी विकास से जुड़ी रही है। इन्हीं कॉलेजों से रिसर्च सेंटर, PG कॉलेज और स्किल यूनिवर्सिटी का रास्ता खुलेगा।
213 प्रखंडों में कॉलेज खोलने की यह योजना बिहार के सामाजिक ढांचे को बदलने की क्षमता रखती है। यह केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं है, बल्कि सपनों की नींव, आत्मनिर्भरता का रास्ता और सामाजिक बराबरी का माध्यम है। यदि यह योजना ईमानदारी से लागू होती है और गुणवत्ता से समझौता नहीं होता है, तो आने वाले दशक में बिहार की पहचान श्रम पलायन वाले राज्य से शिक्षा-आधारित राज्य के रूप में हो सकती है।
