एक जीवित जीवाश्म है - “कोएलाकेंथ”

Jitendra Kumar Sinha
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प्रकृति के रहस्यमय संसार में कुछ जीव ऐसे हैं जो समय की सीमाओं को चुनौती देते प्रतीत होते हैं। “कोएलाकेंथ” ऐसी ही एक मछली है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में जीवित जीवाश्म कहा जाता है। यह नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि यह मछली करोड़ों वर्षों तक लगभग बिना बदले जीवित रही और लंबे समय तक इसे विलुप्त माना जाता था। कोएलाकेंथ की कहानी विज्ञान, विकासवाद और समुद्री रहस्यों का अद्भुत संगम है।


वैज्ञानिकों का मानना था कि “कोएलाकेंथ” लगभग 65 मिलियन वर्ष पहले, डायनासोरों के साथ ही विलुप्त हो चुकी है। लेकिन वर्ष 1938 में दक्षिण अफ्रीका के तट के पास एक मछुआरे के जाल में यह मछली जीवित अवस्था में मिली। इस खोज ने पूरी वैज्ञानिक दुनिया को चौंका दिया। यह घटना जीवविज्ञान के इतिहास में सबसे बड़ी खोजों में से एक मानी जाती है, क्योंकि इससे यह सिद्ध हुआ कि कुछ प्रजातियाँ अत्यंत लंबे समय तक बिना बड़े बदलाव के जीवित रह सकती हैं।


“कोएलाकेंथ” की शारीरिक बनावट इसे अन्य आधुनिक मछलियों से अलग बनाती है। इसका शरीर मोटे, कठोर और कवच जैसे शल्कों से ढका होता है, जो इसे गहरे समुद्र के कठोर वातावरण से बचाता है। इसकी लंबाई लगभग 2 मीटर तक हो सकती है और वजन 90 किलोग्राम तक पहुँच सकता है। सबसे खास बात इसके मांसल पंख हैं। ये पंख सामान्य मछलियों की तरह पतले नहीं हैं, बल्कि मांसल और मजबूत होते हैं, जिनकी बनावट पैरों जैसी प्रतीत होती है।


“कोएलाकेंथ” के पंख वैज्ञानिकों के लिए विशेष रुचि का विषय हैं। इन पंखों की संरचना उन अंगों से मिलती-जुलती है, जिनसे आगे चलकर स्थलीय जीवों के पैर विकसित हुए। यही कारण है कि इसे मछलियों और भूमि पर रहने वाले कशेरुकी जीवों के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। “कोएलाकेंथ” स्वयं मनुष्य की प्रत्यक्ष पूर्वज नहीं है, लेकिन यह उस विकासात्मक मार्ग की झलक देती है, जिसने जल से स्थल तक जीवन की यात्रा को संभव बनाया।


“कोएलाकेंथ” समुद्र के 90 से 700 मीटर की गहराई में पाई जाती है। यह क्षेत्र सूर्य के प्रकाश से लगभग वंचित होता है, जहाँ तापमान कम और दबाव अत्यधिक होता है। ऐसी परिस्थितियों में जीवित रहना आसान नहीं है, लेकिन “कोएलाकेंथ” ने स्वयं को इन हालातों के अनुसार ढाल लिया है। दिन के समय यह प्रायः समुद्री गुफाओं में छिपी रहती है और रात में भोजन की तलाश में बाहर निकलती है।


“कोएलाकेंथ” एक मांसाहारी शिकारी है। इसका आहार मुख्य रूप से छोटी मछलियाँ और अन्य समुद्री जीव होते हैं। यह धीमी गति से तैरती है, लेकिन अवसर मिलने पर अचानक हमला कर शिकार को पकड़ लेती है। इसकी ऊर्जा-संरक्षण रणनीति इसे लंबे समय तक जीवित रहने में मदद करती है।


आज भी “कोएलाकेंथ” अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। इसकी सीमित संख्या और विशिष्ट आवास के कारण इसे संरक्षित प्रजातियों में रखा गया है। अनियंत्रित मछली पकड़ने और समुद्री पर्यावरण में बदलाव इसके लिए खतरा बन सकता है। वैज्ञानिक और संरक्षण संगठन इसके संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं।


“कोएलाकेंथ” केवल एक मछली नहीं है, बल्कि धरती के जैविक इतिहास का जीवित दस्तावेज है। यह बताती है कि जीवन कितनी अद्भुत सहनशीलता और निरंतरता के साथ आगे बढ़ता है। इसकी कहानी यह सिखाती है कि प्रकृति में अभी भी अनगिनत रहस्य छिपे हैं, जिन्हें समझने के लिए धैर्य, जिज्ञासा और सम्मान की आवश्यकता है।



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