प्लास्टिक कचरा आज पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है। नदियों, खेतों और शहरों में फैला यह कचरा न केवल प्रकृति को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा है। ऐसे समय में बिहार के ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा उठाया गया कदम एक मिसाल के रूप में सामने आया है। विभाग ने आधुनिक ग्रीन टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हुए 7,214 किलोमीटर से अधिक लंबी ग्रामीण सड़कों का निर्माण वेस्ट प्लास्टिक से किया है। यह पहल न सिर्फ टिकाऊ विकास की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और बुनियादी ढांचे के सशक्तिकरण का भी बेहतरीन उदाहरण है।
प्लास्टिक अपशिष्ट वर्षों तक नष्ट नहीं होता है और मिट्टी, जल तथा वायु को प्रदूषित करता है। बिहार में पहले यह कचरा नालियों, खेतों और खुले स्थानों में जमा होकर पर्यावरणीय संकट पैदा करता था। लेकिन अब वही प्लास्टिक सड़क निर्माण की सामग्री बनकर उपयोगी संसाधन में बदल गया है। इस प्रक्रिया ने यह सिद्ध कर दिया है कि सही तकनीक और नीति के साथ कचरे को भी विकास का आधार बनाया जा सकता है।
ग्रामीण सड़कों के निर्माण में प्रयुक्त यह तकनीक प्लास्टिक अपशिष्ट को बिटुमिन के साथ मिलाकर सड़क की सतह तैयार करती है। इससे सड़कें अधिक मजबूत, टिकाऊ और जलरोधी बनती हैं। पारंपरिक सड़कों की तुलना में प्लास्टिक मिश्रित सड़कें ज्यादा समय तक चलती हैं और रखरखाव पर कम खर्च आता है। यही कारण है कि यह तकनीक न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी है, बल्कि आर्थिक रूप से भी व्यावहारिक साबित हो रही है।
वेस्ट प्लास्टिक से बनी सड़कों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी मजबूती है। ये सड़कें भारी वर्षा, अधिक तापमान और ट्रैफिक दबाव को बेहतर ढंग से सहन करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां सड़कों की गुणवत्ता अक्सर चुनौती बनी रहती है, वहां यह तकनीक जीवनदायिनी साबित हुई है। इससे गांवों को बाजार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने में भी तेजी आई है।
इस पहल से हजारों टन प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्रण संभव हुआ है। जो प्लास्टिक पहले प्रदूषण फैलाता था, वही अब सड़क की आधारशिला बनकर पर्यावरण की रक्षा कर रहा है। इससे नदियों और भूमि में प्लास्टिक जाने की मात्रा में कमी आई है। यह कदम स्वच्छता अभियान और जलवायु संरक्षण के लक्ष्यों के साथ भी पूरी तरह मेल खाता है।
ग्रामीण कार्य विभाग ने सड़क निर्माण के साथ-साथ हरियाली पर भी विशेष ध्यान दिया है। सड़कों के किनारे वृक्षारोपण, पौधों की सुरक्षा और हरित पट्टियों का विकास किया जा रहा है। इससे न केवल पर्यावरण संतुलन बना रहता है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों की सुंदरता और जैव विविधता में भी वृद्धि होती है। सड़कें अब सिर्फ आवागमन का साधन नहीं रहीं, बल्कि हरित विकास का प्रतीक बन गई हैं।
बेहतर सड़कें ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती हैं। प्लास्टिक कचरे से बनी इन सड़कों ने किसानों, छोटे व्यापारियों और श्रमिकों को बाजारों तक आसान पहुंच दी है। परिवहन लागत में कमी आई है और रोजगार के नए अवसर भी सृजित हुए हैं। साथ ही, कचरा संग्रहण और पुनर्चक्रण से जुड़े लोगों को भी काम मिला है, जिससे स्थानीय स्तर पर आय के स्रोत बढ़े हैं।
बिहार की यह पहल देश के अन्य राज्यों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकती है। यदि हर राज्य इस तरह की ग्रीन टेक्नोलॉजी को अपनाए, तो प्लास्टिक कचरे की समस्या काफी हद तक कम की जा सकती है। साथ ही, टिकाऊ और मजबूत बुनियादी ढांचे का निर्माण भी संभव होगा।
प्लास्टिक कचरे से 7,214 किलोमीटर सड़क निर्माण बिहार की दूरदर्शी सोच और नवाचार का प्रतीक है। यह पहल साबित करती है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकता है। जब कचरा संसाधन बन जाए और सड़कें हरियाली के साथ आगे बढ़ें, तब सतत विकास का सपना हकीकत में बदलता है। बिहार ने इस दिशा में जो कदम उठाया है, वह आने वाले समय में पूरे देश के लिए एक मजबूत राह दिखा सकता है।
