देश के शहरी जीवन में बीते कुछ वर्षों में “मिडनाइट फूड कल्चर” तेज़ी से उभरा है। जोधपुर जैसे शहर, जो कभी रात में अपेक्षाकृत शांत रहता था, अब देर रात तक जगमगाते कैफे, ढाबों और “क्लाउड किचन” से भरे नजर आते हैं। मोबाइल ऐप्स, सोशल मीडिया ट्रेंड्स, नाइट लाइफ और “फ्लेक्सिबल वर्किंग ऑवर्स” ने युवाओं की जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन इस बदलाव की एक भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। वह है सेहत की कीमत। चिकित्सकों के अनुसार, देर रात खाने की आदत पेट की बीमारियों, मोटापे, ब्लड शुगर असंतुलन और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे रही है।
“मिडनाइट फूड कल्चर” का अर्थ है रात 11 बजे के बाद भोजन करना। चाहे बाहर जाकर या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से ऑर्डर करके। इसमें आमतौर पर शामिल होते हैं पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज, मोमोज, चाउमीन, रोल्स, तला-भुना, मसालेदार और हाई-कैलोरी फूड, शुगर युक्त पेय और कैफीन ड्रिंक्स। यह कल्चर विशेष रूप से 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग में लोकप्रिय है, जिसे आज जेन-जी और यंग मिलेनियल्स कहा जाता है।
पिछले पांच वर्षों में जोधपुर में 50 से अधिक मिडनाइट कैफे और क्लाउड किचन सक्रिय हुआ है। कम लागत, सीमित स्टाफ और केवल डिलीवरी मॉडल ने इस बिजनेस को बेहद आकर्षक बना दिया है। रात 12 से 2 बजे तक “30 मिनट में डिलीवरी” जैसे वादे युवाओं को देर रात खाने के लिए प्रेरित करता है। रील्स, व्लॉग्स और “लेट नाइट फूड चैलेंज” जैसे ट्रेंड्स ने इसे कूल लाइफस्टाइल का हिस्सा बना दिया है। आईटी, फ्रीलांसिंग, कॉल सेंटर्स और नाइट शिफ्ट जॉब्स के कारण सोने-जागने का समय पूरी तरह बदल गया है।
जोधपुर के अस्पतालों में प्रतिदिन करीब 100 नए मरीज पेट संबंधी समस्याओं के साथ पहुंच रहे हैं। इनमें अधिकांश युवा हैं। आम शिकायतें एसिडिटी और गैस, अपच और पेट दर्द, एसिड रिफ्लक्स, कब्ज या डायरिया, चिड़चिड़ापन और थकान। चिकित्सकों का कहना है कि देर रात भोजन इन समस्याओं का प्रमुख कारण बन रहा है।
मानव शरीर एक सर्केडियन रिद्म पर काम करता है यानि 24 घंटे की जैविक घड़ी। दिन में पाचन तंत्र अधिक सक्रिय रहता है और रात होते-होते मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों मानते हैं कि रात 10 बजे के बाद भारी भोजन पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
लेट नाइट फूड से पेट में एसिड का स्राव बढ़ता है, जिससे सीने में जलन और खट्टी डकारें होती हैं। अनियमित खान-पान से आंतों की कार्यप्रणाली बिगड़ती है। रात में ली गई कैलोरी खर्च नहीं हो पाती है, जिससे फैट के रूप में जमा होती है। प्रिजर्वेटिव और रिफाइंड कार्ब्स ब्लड शुगर को अचानक बढ़ाते और गिराते हैं।
गेस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट के अनुसार,“मिडनाइट फूड में अधिक मसाले और प्रिजर्वेटिव होते हैं। इससे ब्लड शुगर अचानक बढ़ता है, फिर गिरता है, जिससे दोबारा भूख लगती है और अनियमित खाने की आदत विकसित होती है।” वे सलाह देते हैं कि रात का भोजन हल्का रखना चाहिए। सोने से कम से कम दो घंटे पहले खाना खा लें। एसोसिएट प्रोफेसर बताते हैं कि “देर रात खाने से हमारा सर्केडियन रिद्म बिगड़ जाता है, जिसका असर नींद, हार्मोन और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।”
जेन-जी, जल्दी लोकप्रिय ट्रेंड अपनाती है। सोशल मीडिया से अधिक प्रभावित होती है। फिजिकल एक्टिविटी कम और स्क्रीन टाइम ज्यादा देते हैं। इस कारण कम उम्र में ही डायबिटीज की आशंका बनी रहती है। फोकस और प्रोडक्टिविटी में गिरावट आती है। एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा होता है।
क्लाउड किचन ने रोजगार और उद्यमिता के अवसर दिया है , लेकिन गुणवत्ता नियंत्रण की कमी, ताजेपन पर सवाल, अधिक तेल और मसालों का उपयोग, यह मॉडल मुनाफा केंद्रित है, न कि सेहत केंद्रित।
आयुर्वेद के अनुसार सूर्यास्त के बाद अग्नि (पाचन शक्ति) मंद हो जाती है। रात का भोजन सुपाच्य और सीमित होना चाहिए। दही, तला-भुना और मीठा रात में वर्जित माना गया है।
व्यक्तिगत स्तर पर समय पर भोजन की आदत, हेल्दी स्नैक्स (फल, सूप), कैफीन और जंक फूड से दूरी बनाना जरूरी है। सामाजिक स्तर पर युवाओं में जागरूकता अभियान, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर हेल्थ टॉक्स दिया जाना चाहिए। नीति स्तर पर मिडनाइट फूड आउटलेट्स के लिए पोषण मानक और क्लाउड किचन की नियमित जांच होनी चाहिए।
“मिडनाइट फूड कल्चर” आज केवल एक ट्रेंड नहीं है, बल्कि जेन-जी के लिए खतरे की घंटी बन चुका है। सुविधा, स्वाद और सोशल स्टेटस के पीछे भागते हुए अपनी सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं। जरूरत है संतुलन की, जहां आधुनिक जीवनशैली के साथ स्वस्थ आदतें भी अपनाई जाएं।
