भारतीय सनातन परंपरा में होली मात्र एक पर्व नहीं है, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय, अमंगल पर मंगल, असत्य पर सत्य और तमस से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है। यह उत्सव मनुष्य के नैसर्गिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तरों को स्पर्श करता है। वसंत ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति जिस प्रकार नवीनता धारण करती है, उसी प्रकार होली मानव-मन में नवचेतना, शुद्धि और सद्गुणों के जागरण का आह्वान करती है।
धर्मशास्त्रों में होली को अग्नि-तत्त्व की उपासना, त्रेता युग के प्रथम यज्ञ की स्मृति, और भक्ति की अडिगता के प्रतीक के रूप में वर्णित किया गया है। यह पर्व फाल्गुनी पूर्णिमा के दिन और कहीं-कहीं पंचमी तक, विविध रूपों में मनाया जाता है।
वेद-पुराणों में अग्नि को देवों का मुख कहा गया है, यज्ञ का आरंभ और समापन अग्नि से ही होता है। होली में अग्नि-उपासना के माध्यम से अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष जैसे दोषों के दहन का भाव निहित है। यह पर्व स्मरण कराता है कि बाह्य रंगों से पहले अंतःकरण को रंगना आवश्यक है।
धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार, होली के दिन अग्नि-तत्त्व लगभग 2 प्रतिशत अधिक सक्रिय रहता है। इस दिन अग्निदेव की पूजा से तेज-तत्त्व की प्राप्ति होती है, जिससे रज-तम प्रवृत्तियाँ क्षीण होती हैं। होलिका दहन में लकड़ियों का विधिपूर्वक संकलन, सज्जा, पूजन और प्रज्वलन, सब शुद्धि और कृतज्ञता के भाव से किए जाते हैं।
होलिका दहन का केंद्रीय आख्यान भक्त प्रह्लाद और होलिका से जुड़ा है। प्रह्लाद, बचपन से ही विष्णु के अनन्य भक्त थे। उनके पिता हिरण्यकश्यप अहंकारवश स्वयं को ईश्वर मानते थे और पुत्र की भक्ति से क्रुद्ध रहते थे।
हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान था कि विशेष आवरण के साथ अग्नि उसे जला न सके। दुरुपयोग के परिणामस्वरूप, जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्निकुंड में बैठी, तो होलिका भस्म हुई और प्रह्लाद अडिग भक्ति से सुरक्षित रहे। यही असत्य के नाश और सत्य की विजय का शाश्वत संदेश है।
अंततः धर्म की रक्षा हेतु नृसिंह अवतार प्रकट हुआ। न दिन, न रात; न घर के भीतर, न बाहर; न शस्त्र, न अशस्त्र, वरदान की सीमाओं के बीच अधर्म का अंत हुआ। यह कथा बताती है कि ईश्वर-न्याय समय, स्थान और साधन से परे होकर भी अचूक होता है।
प्रह्लाद का जीवन केवल भक्ति का नहीं है, ज्ञान और नीति का भी आदर्श है। परंपराओं में उनके गुरु के रूप में नारद आदि ऋषियों का उल्लेख मिलता है। प्रह्लाद के पुत्र विरोचन और आगे राजा बलि तक यह वंश संस्कृति-राजनीति में महत्वपूर्ण माना गया है। यहाँ आत्म-संस्कृति और भोग-संस्कृति के द्वंद्व की कथाएँ भी लोक में प्रचलित हैं।
भविष्य पुराण में वर्णित ढुंढा राक्षसी की कथा बताती है कि कैसे सामूहिक साहस, अग्नि और शुद्ध वाणी से अनिष्ट शक्तियों का निवारण हुआ। यह लोक-आस्था होली को सामुदायिक शुद्धि का पर्व सिद्ध करती है।
वसंत ऋतु में प्रकृति का नवसृजन, फूलों की बहार, मधुर पवन, मानव मन में उत्साह और सकारात्मकता का संचार करता है। रंगों का प्रयोग भावनात्मक विमोचन और सामाजिक मेल को बढ़ाता है, बशर्ते वह मर्यादा में हो।
ब्रज में होली लीलामय भक्ति का उत्सव है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना, नंदगाँव में हर स्थान की होली अनूठी है। बरसाना की लठमार होली और वृंदावन की फूलों की होली विश्वविख्यात हैं।
उत्तर भारत की रंगीली होली से लेकर महाराष्ट्र की रंग पंचमी, बंगाल की डोल जात्रा, और दक्षिण के कुछ क्षेत्रों में काम-दहन, हर प्रदेश में परंपरा स्थानीय संस्कृति से रची-बसी है।
होलिका स्थापना शुद्ध स्थान पर और प्राकृतिक लकड़ियों से किया जाता है। इसका पूजन अग्निदेव, प्रह्लाद स्मरण के साथ किया जाता है। होलिका दहन अहंकार-द्वेष का प्रतीकात्मक त्याग का है। होलिका दहन के अगले दिन सौहार्द, क्षमा, रंगों से मेल मिलाप के साथ होली मनाया जाता है। लेकिन आज गंदे पानी के गुब्बारे, रासायनिक रंग, मद्यपान और हुड़दंग जैसी विकृतियाँ पर्व की आत्मा को आहत करती हैं। यह अधर्म है, क्योंकि इससे स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा पर आघात होता है।
होली में प्राकृतिक रंग अपनाना चाहिए। अनुमति और मर्यादा का पालन करना चाहिए। नशामुक्त उत्सव मनाना चाहिए। पर्यावरण-संरक्षण का ध्यान रखना चाहिए। बुजुर्ग, बच्चे और पशु, सबकी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहिए।
होलिका दहन सिखाता है कि वरदान भी दुरुपयोग से अभिशाप बन सकता है और सच्ची भक्ति हर अग्नि में रक्षक बनती है। होली पर धर्मशास्त्रीय मर्यादा, सामाजिक जिम्मेदारी और आध्यात्मिक चेतना के साथ उत्सव मनाने का संकल्प ले कर रंग केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि चरित्र में भी उतारना चाहिए।
