दक्षिण-पूर्व एशिया का देश इंडोनेशिया एक बार फिर प्राकृतिक आपदा की आशंका से जूझ रहा है। इस बार मामला भूकंप या ज्वालामुखी विस्फोट का नहीं है, बल्कि खेतों की जमीन के अचानक धंस जाने का है। केटोल जिले में देखते-देखते उपजाऊ कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा धरती में समा गया। अब तक 30,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र प्रभावित हो चुका है, जिससे ग्रामीणों में दहशत का माहौल है।
स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों के अनुसार, यह घटना बिना किसी पूर्व चेतावनी के हुई है। पहले खेतों की सतह पर दरारें दिखाई दीं, फिर कुछ ही घंटों में जमीन बैठती चली गई और एक विशाल गड्ढे का रूप ले लिया। कई किसानों की फसलें पूरी तरह नष्ट हो गईं। यह इलाका धान और सब्जी उत्पादन के लिए जाना जाता था, जिससे ग्रामीणों की आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित हुई है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि धंसाव का दायरा अभी भी बढ़ सकता है। गांववालों को डर है कि यदि यह प्रक्रिया जारी रही तो रिहायशी इलाके भी इसकी चपेट में आ सकता है। कुछ परिवारों ने एहतियातन अपने घर खाली कर रिश्तेदारों के यहां शरण ले ली है। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं में भय का माहौल है। रात के समय जमीन से आने वाली हल्की आवाजें और कंपन लोगों की चिंता को और बढ़ा रही हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह की घटनाओं के पीछे कई कारण हो सकते हैं। भूजल का अत्यधिक दोहन- लगातार पानी खींचे जाने से जमीन के नीचे खाली जगह बन जाती है। चूना-पत्थर (कार्स्ट) क्षेत्र- यदि जमीन के नीचे घुलनशील चट्टानें हों, तो वे धीरे-धीरे खोखली हो जाती हैं। भारी वर्षा और जलभराव- इंडोनेशिया में मानसून के दौरान अधिक बारिश से मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है। भूकंपीय गतिविधि- भले ही कोई बड़ा भूकंप न आया हो, लेकिन सूक्ष्म कंपन भी धंसाव को ट्रिगर कर सकता है।
स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्र को नो-एंट्री जोन घोषित कर दिया है। भू-वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन टीमों को मौके पर भेजा गया है ताकि जमीन की संरचना और खतरे के स्तर का आकलन किया जा सके। ड्रोन सर्वे और सैटेलाइट इमेजरी के जरिए यह समझने की कोशिश की जा रही है कि धंसाव आगे कितनी तेजी से फैल सकता है।
खेती इस क्षेत्र की रीढ़ है। जमीन धंसने से न केवल मौजूदा फसल नष्ट हुई है, बल्कि आने वाले मौसम की बुवाई भी संकट में पड़ गई है। किसानों को मुआवजे और वैकल्पिक आजीविका की मांग करनी पड़ रही है। यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो इसका असर स्थानीय खाद्य आपूर्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी घटनाएं जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित विकास और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन का संकेत हैं। दीर्घकालिक समाधान के लिए भूजल प्रबंधन को सख्त बनाना। जोखिम वाले इलाकों की मैपिंग। निर्माण और खेती के लिए वैज्ञानिक दिशानिर्देश और समय पर चेतावनी प्रणाली जैसे कदम जरूरी हैं।
केटोल जिले में खेतों की जमीन का अचानक धंसना केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है। यह याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ संतुलन बिगड़ा तो परिणाम कितने भयावह हो सकता है। प्रशासन, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदाय को मिलकर काम करना होगा ताकि इस संकट से निपटा जा सके और भविष्य में ऐसी आपदाओं को रोका जा सके।
