राष्ट्र, बजट और चेतन नागरिक की भूमिका - चिंता से चिंतन तक

Jitendra Kumar Sinha
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चिंता और चिता के बीच केवल एक बिंदु का अंतर होता है, लेकिन यही बिंदु मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व को परिभाषित करता है। एक अवस्था में प्राण रहते हुए व्यक्ति स्वयं को जलाता है, दूसरी में प्राण त्यागने के बाद अग्नि का स्पर्श होता है। यह सूक्ष्म अंतर केवल शब्दों का नहीं है, बल्कि चेतना की दिशा का अंतर है। इसी प्रकार चिंता और चिंतन के बीच भी एक अत्यंत महीन रेखा खिंची हुई है। रेखा इतनी महीन है कि कब व्यक्ति रचनात्मक चिंतन से फिसलकर विनाशकारी चिंता में प्रवेश कर जाता है, उसे स्वयं भी भान नहीं होता है।

आज का भारत, और विशेषकर उसका जागरूक नागरिक, इसी रेखा के इर्द-गिर्द खड़ा है। राष्ट्र के समक्ष खड़ी वैश्विक चुनौतियाँ, आंतरिक आकांक्षाएँ, आर्थिक अपेक्षाएँ और राजनीतिक पूर्वाग्रह, इन सबके बीच आम बजट केवल एक वित्तीय दस्तावेज नहीं रह गया है, बल्कि यह सामूहिक मनोविज्ञान का दर्पण बन चुका है।

चिंता एक ऐसी मानसिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति समस्या को देखता तो है, लेकिन समाधान की दिशा में चलने के बजाय भय, शंका और असुरक्षा में उलझ जाता है। चिंता ऊर्जा को खा जाती है, जबकि चिंतन ऊर्जा को दिशा देता है। ठीक इसके विपरीत चिंतन प्रश्न करता है, पर हताश नहीं होता है। आलोचना करता है, पर नकारात्मक नहीं बनता है। शंका करता है, पर संदेह में नहीं डूबता है।

जहाँ चिंता व्यक्ति को स्वार्थ-केंद्रित बनाती है, वहीं चिंतन उसे समष्टि-केंद्रित बनाता है। चिंता व्यक्ति को तत्काल लाभ और हानि के गणित में उलझाती है, चिंतन उसे दीर्घकालीन दृष्टि देता है।

आधुनिक समाज में चिंता का सबसे बड़ा पोषक तत्व है “व्यक्तिगत स्वार्थ”। जब सोच का उद्देश्य केवल “मुझे क्या मिलेगा” तक सीमित हो जाता है, तब वही सोच नकारात्मकता को जन्म देती है। बजट से पहले ही किसी को टैक्स स्लैब की चिंता होती है, तो किसी को सब्सिडी न मिलने की और किसी को अपने वर्ग की अनदेखी का भय। इन सबके मूल में राष्ट्र नहीं, स्व है। यही वह बिंदु है जहाँ चिंतन चिंता में बदल जाता है।

विचार वही मूल्यवान होता है जो समाधान की ओर ले जाए। उद्देश्यपूर्ण चिंतन समस्या को स्वीकार करता है। सीमाओं को समझता है। संसाधनों की वास्तविकता पहचानता है और फिर रास्ता खोजता है। राष्ट्र का बजट भी इसी प्रक्रिया का परिणाम होता है। कोई भी वित्त मंत्री जादू की छड़ी लेकर नहीं बैठता है। संसाधन सीमित होते हैं, अपेक्षाएँ असीमित।

राष्ट्र के प्रति चिंता और राष्ट्र के लिए चिंतन, दोनों में मूलभूत अंतर है। क्योंकि राष्ट्र के प्रति चिंता करने वाला केवल दोष खोजता है और राष्ट्र के लिए चिंतन करने वाला समाधान सुझाता है। पहला वर्ग सोशल मीडिया पर शोर करता है, दूसरा समाज में स्थायित्व लाता है।

आज स्थिति यह है कि बजट आने से पहले ही लोग “फ्लॉप बजट” के शीर्षक तैयार कर लेते हैं। “जनविरोधी” और “कॉरपोरेटपरस्त” जैसे टैग तय करने लगते हैं और यह भी तय कर लेते हैं है कि वित्त मंत्री हिट होंगी या फ्लॉप। यह विश्लेषण नहीं, अभ्यास है, वह भी पूर्वाग्रह का अभ्यास।

जब वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी, युद्ध, आपूर्ति श्रृंखला संकट और भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही हो तो ऐसे में भारत की 7% से ऊपर की विकास दर चिंता का नहीं, चिंतन का विषय होनी चाहिए। यह पूछना अधिक सार्थक है कि यह वृद्धि कैसे टिकाऊ बने। इसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुँचे और यह आत्मनिर्भरता को कैसे मजबूत करे।

बजट को व्यक्ति-केंद्रित करके देखना भी चिंता की प्रवृत्ति होती है। प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि वित्त मंत्री “सीतारमण हिट होगी या फ्लॉप”, बल्कि  यह होना चाहिए कि क्या यह बजट भारत की दीर्घकालीन जरूरतों से मेल खाता है? क्या यह उत्पादन, निवेश और रोजगार को गति देता है? क्या यह सामाजिक संतुलन बनाए रखता है?

मीडिया का एक वर्ग चिंता को बेचता है क्योंकि चिंता बिकती है। क्योंकि चिंतन टीआरपी नहीं लाता है, लेकिन राष्ट्र को दिशा देता है। जब विमर्श शोर बन जाए, तब समझना चाहिए कि चिंतन समाप्त हो रहा है। एक जागरूक नागरिक न अंधभक्त होता है और न अंधविरोधी। वह प्रश्न करता है, पर देशहित के धरातल पर खड़ा होकर।

राष्ट्र का कल्याण किसी एक बजट से नहीं होता है, बल्कि नागरिक के विचार से शुरू होता है। जब व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचता है, तभी राष्ट्र की चिंता, राष्ट्र का चिंतन बनती है।

चिंता व्यक्ति को जलाती है, चिंतन व्यक्ति को गढ़ता है। चिंता राष्ट्र को कमजोर करती है, चिंतन राष्ट्र को सशक्त बनाता है। कल बजट आया, संख्याएँ बदली, शीर्षक बने, बहसें शुरू हो गईं। लेकिन नागरिक अपने भीतर चिंतन को जीवित रखे हुए हैं, तो चाहे कोई भी बजट हो, राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित रहेगा।



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