इतिहास में किसी भी व्यक्ति, वंश, संस्था या राजनीतिक दल का पतन एक दिन में नहीं होता है। वह न तो किसी चुनावी हार से शुरू होता है, न किसी विरोधी की चाल से समाप्त होता है। पतन का बीज बहुत पहले बोया जा चुका होता है मन के भीतर, चेतना के तल पर, जहाँ अहंकार विवेक पर विजय पा लेता है।
भारतीय राजनीति के संदर्भ में यदि आज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थिति देखें, तो प्रश्न केवल यह नहीं है कि वह सत्ता से बाहर क्यों है, बल्कि यह है कि वह आत्मा से क्यों कट गई। राजनीति केवल सत्ता का गणित नहीं होती है। वह समाज की चेतना का प्रतिबिंब होती है और जब किसी दल की चेतना दूषित हो जाती है, तो उसके निर्णय भी विवेकहीन हो जाते हैं।
अहंकार स्वयं में कोई गाली नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब अहंकार स्वाभिमान से अलग होकर आत्ममुग्धता बन जाता है। स्वाभिमान कहता है कि “मैं जिम्मेदार हूँ” और अहंकार कहता है “मैं ही सब कुछ हूँ”। कांग्रेस के इतिहास में एक समय ऐसा था जब वह स्वयं को भारत की आत्मा समझती थी। धीरे-धीरे वही भावना बदलकर भारत को अपनी संपत्ति समझने की मानसिकता में परिवर्तित हो गई। यहीं से पतन का बीज पड़ा। जब कोई दल यह मानने लगता है कि देश उसके बिना चल ही नहीं सकता, तब वह जनता की चेतना से कटने लगता है।
राजनीति केवल सरकार चलाने का नाम नहीं है। वह यह भी तय करती है कि एक राष्ट्र दुनिया के सामने किस रूप में प्रस्तुत होगा। भारत कोई सामान्य राष्ट्र नहीं है। यह सभ्यता है हजारों वर्षों की साधना से गढ़ी गई चेतना। लेकिन जब राजनीति संस्कृति को बोझ और सभ्यता को पिछड़ापन समझने लगे, तब वह स्वयं अपनी जड़ों को काटने लगती है। पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस की राजनीति में एक अजीब-सी हड़बड़ी दिखी है “दुनिया को दिखाना है कि हम आधुनिक हैं”। लेकिन आधुनिकता और नग्न प्रदर्शन में अंतर होता है। सभ्यता का उत्कर्ष देह के प्रदर्शन से नहीं, विचार के परिष्कार से होता है।
जब कोई राजनीतिक दल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करता है, तो वह केवल पार्टी नहीं होता है बल्कि वह राष्ट्र की चेतना होता है। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि किस कार्यक्रम में क्या हुआ। प्रश्न यह है कि दृष्टिकोण क्या था? क्या उद्देश्य यह था कि भारत की गहराई, दर्शन और सभ्यता दुनिया के सामने रखी जाए? या फिर यह भावना थी कि “जो पश्चिम को भाता है, वही प्रगति है”? यह मानसिक दासता किसी भी राष्ट्र को भीतर से खोखला कर देती है।
जब विवेक मौन हो जाता है, तब पतन जन्म लेता है। विवेक पूछता है कि क्या यह सही है? क्या यह आवश्यक है? क्या यह हमारे मूल स्वभाव के अनुकूल है? लेकिन जब अहंकार उत्तर देने लगे, तो विवेक चुप हो जाता है। राजनीति में यह स्थिति सबसे खतरनाक होती है। क्योंकि तब निर्णय जनहित से नहीं, जिद से लिए जाते हैं।
कांग्रेस के पतन को अक्सर केवल परिवारवाद से जोड़ा जाता है। लेकिन परिवारवाद स्वयं में कारण नहीं है बल्कि वह लक्षण है। जबकि मूल समस्या है सत्ता को सेवा नहीं, विरासत मान लेना। जहाँ नेतृत्व योग्यता से नहीं, वंश से तय होने लगे, वहाँ विचार मरने लगता है और जहाँ विचार मर जाता है तो वहाँ संगठन केवल खोल रह जाता है।
यह प्रश्न अत्यंत गंभीर है कि क्या भारत की बदनामी में किसी दल की भलाई हो सकती है? उत्तर स्पष्ट है कि नहीं। जो दल राष्ट्र को कमजोर दिखाकर अपनी राजनीति चमकाना चाहता है, वह अंततः स्वयं भी नष्ट हो जाता है। क्योंकि जनता दल बदल सकती है, लेकिन राष्ट्र के अपमान को कभी क्षमा नहीं करती।
भगवद्गीता स्पष्ट कहती है कि “अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध से युक्त व्यक्ति अपने ही विनाश का कारण बनता है।” यह केवल आध्यात्मिक सत्य नहीं है बल्कि राजनीतिक यथार्थ भी है। जब कोई दल अपनी आत्मा से कट जाता है, तो उसके पास न विचार बचता है, न भविष्य।
कांग्रेस का पतन किसी चुनावी हार की कहानी नहीं है। यह चेतना के पतन की कथा है। यह कथा सिखाती है कि अहंकार विवेक को निगल जाता है। विवेक के बिना चरित्र गिरता है और चरित्र गिरते ही इतिहास दंड देता है।
लोकतंत्र में सत्ता का स्रोत न संविधान की किताब होती है, न मीडिया की सुर्खियाँ, बल्कि वह जनता की चेतना होती है। जब कोई राजनीतिक दल यह मानने लगे कि जनता को “समझाने” की ज़रूरत है, लेकिन जनता को “सुनने” की नहीं, तब संवाद समाप्त हो जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ से कांग्रेस धीरे-धीरे जनमानस से कटती चली गई। जनता बदल रही थी, उसकी आकांक्षाएँ बदल रही थीं, उसका आत्मविश्वास बढ़ रहा था, उसकी सांस्कृतिक स्मृति जाग रही थी। लेकिन कांग्रेस अब भी उसी पुराने खांचे में सोच रही थी कि जहाँ जनता या तो “ग़रीब” है या “अशिक्षित” या “भावनाओं में बहकाई जा सकने वाली भीड़”। यह दृष्टि किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती होती है।
इक्कीसवीं सदी का भारत, बीसवीं सदी का भारत नहीं है। यह भारत अपनी सभ्यता को लेकर अपराधबोध में नहीं है। अपनी परंपराओं को छुपाता नहीं है। अपनी पहचान पर प्रश्नचिह्न नहीं लगने देता है। यह वही भारत है जो कहता है कि “हम आधुनिक भी हैं और सनातन भी।” लेकिन कांग्रेस इस द्वैत को समझ ही नहीं पाई। उसने आधुनिकता को परंपरा का विरोधी मान लिया, जबकि भारतीय चेतना में आधुनिकता और परंपरा परस्पर विरोधी नहीं, पूरक हैं।
किसी भी राष्ट्र के पतन का सबसे गहरा कारण होता है मानसिक गुलामी। जब किसी देश या दल को यह लगने लगे कि “हम तभी सही हैं, जब पश्चिम हमें स्वीकार करे”, तो समझ लेना चाहिए कि आत्मा संकट में है। कांग्रेस की राजनीति में यह मानसिकता स्पष्ट दिखाई देने लगी है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को “समस्या” के रूप में प्रस्तुत करना। आंतरिक मुद्दों को बाहरी हस्तक्षेप का विषय बनाना। अपनी ही संस्कृति को “संकीर्ण” कहकर नकारना। यह राजनीति नहीं, आत्महीन प्रदर्शन बन जाता है।
कांग्रेस कभी विचारधारा का दल हुआ करती थी। उसके पास स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति थी। सामाजिक न्याय का दर्शन था और राष्ट्रीय एकता की भाषा थी। लेकिन समय के साथ विचारधारा नारों में बदल गई और नारे तब तक ही चलते हैं जब तक उनके पीछे कोई जीवंत विचार खड़ा हो। जब विचार मर जाता है, तो नारा भी खोखला होकर गिर जाता है।
किसी संगठन की मजबूती इससे नहीं मापी जाती है कि उसमें कितने नेता हैं, बल्कि इससे मापी जाती है कि उसमें कितनी असहमति सुरक्षित है। जहाँ प्रश्न पूछना विद्रोह मान लिया जाए, जहाँ सुझाव देना अवज्ञा समझा जाए, वहाँ संगठन नहीं, दरबार चलता है। कांग्रेस के भीतर यह भावना गहराती चली गई है कि “नेतृत्व पर सवाल नहीं, केवल समर्थन होना चाहिए।” यहीं से जमीनी कार्यकर्ता टूटने लगा और संगठन भीतर से खोखला होता चला गया।
राजनीति में साध्य (लक्ष्य) और साधन (तरीका) दोनों का महत्व होता है। लेकिन जब साधन साध्य से बड़ा हो जाए, तब पतन तय हो जाता है। कांग्रेस की राजनीति में धीरे-धीरे यह भाव आया कि “जीत कैसे भी होनी चाहिए”। यह सोच अवसरवाद को जन्म देती है। सिद्धांतहीन गठबंधनों को वैध बनाती है और नैतिकता को “बाधा” घोषित कर देती है। यह वही क्षण होता है जब राजनीति सेवा नहीं, व्यवसाय बन जाती है।
भगवद्गीता केवल मोक्ष का ग्रंथ नहीं है, वह नेतृत्व का भी शास्त्र है। गीता कहती है कि “जो कर्तव्य से हटकर अहंकार में निर्णय लेता है, वह स्वयं का ही शत्रु बन जाता है।” राजनीति में जब कर्तव्य की जगह अहंकार ले ले, तो पतन केवल समय का प्रश्न रह जाता है। कांग्रेस का संकट सिर्फ संगठनात्मक नहीं है। यह मानसिक और वैचारिक संकट है। यह संकट पैदा हुआ जनता से कटाव से, आत्मबोध के अभाव से, पश्चिमी अनुमोदन की लालसा से और विवेक के मौन से।
इतिहास में यह मान्यता प्रचलित है कि हर पतन के बाद पुनरुत्थान की संभावना होती है। लेकिन यह संभावना स्वतः नहीं आती। इसके लिए आत्मस्वीकार आवश्यक होता है। पुनरुत्थान तभी होता है जब व्यक्ति या संस्था अपनी गलतियों को पहचानती है। दोष दूसरों पर नहीं, स्वयं पर लेती है और सबसे कठिन कार्य करती है अहंकार का त्याग। कांग्रेस के संदर्भ में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या वह स्वयं को दोषी मानने को तैयार है?
राजनीति में आत्मालोचना और आत्मदया दोनों अलग-अलग स्थितियाँ हैं। आत्मालोचना कहती है “हमसे भूल हुई, हमें बदलना होगा।” आत्मदया कहती है “दुनिया हमें समझ नहीं पाई, हम सही थे।” कांग्रेस की राजनीति में लंबे समय से आत्मदया हावी रही है। हर हार के बाद ईवीएम को दोष, मीडिया को दोष और जनता को “भ्रमित” बताना। लेकिन शायद ही कभी यह स्वीकार किया गया कि “हम जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे।” जब तक यह स्वीकार नहीं होगा, पुनरुत्थान केवल शब्दों में रहेगा।
किसी भी राजनीतिक दल के लिए नेतृत्व केवल चेहरा नहीं होता है, वह दृष्टि होता है। जब नेतृत्व प्रश्नों से बचने लगे, आलोचना को शत्रुता माने और निर्णयों को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से जोड़ दे, तो संगठन धीरे-धीरे नेतृत्व का बंधक बन जाता है। कांग्रेस का संकट यहीं सबसे गहरा हो जाता है। क्योंकि यहाँ समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि नेतृत्व की संस्कृति की है।
आज का युवा प्रश्न करता है, उत्तर चाहता है और प्रतीकों से नहीं, परिणामों से प्रभावित होता है। वह यह जानना चाहता है कि रोजगार कहाँ है? अवसर कैसे मिलेंगे? और राष्ट्र का भविष्य क्या है? लेकिन जब राजनीति केवल अतीत की विरासत और भावनात्मक आरोपों तक सीमित हो जाए, तो युवा उससे दूर चला जाता है। कांग्रेस की भाषा युवाओं की आकांक्षाओं से मेल नहीं खा सकी है।
लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है। लेकिन विरोध जब स्वयं लक्ष्य बन जाए, तब वह नकारात्मकता में बदल जाता है। आज कांग्रेस की राजनीति अक्सर इस प्रश्न में उलझी दिखती है कि “सत्ता पक्ष को कैसे रोका जाए?” लेकिन जनता पूछती है कि “अगर आप आए, तो क्या करेंगे?” जब विकल्प स्पष्ट नहीं होता है तो विरोध विश्वसनीय नहीं रह जाता है।
राजनीति का अंतिम कसौटी-बिंदु यही है कि राष्ट्र पहले या सत्ता पहले? जो दल राष्ट्रहित को सत्ता-संघर्ष का औजार बनाए। राष्ट्रीय मंचों पर देश की छवि को कमजोर करे और आंतरिक मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय विवाद बनाए, वह दल अल्पकालिक सुर्खियाँ तो पा सकता है, लेकिन दीर्घकालिक विश्वास खो देता है। जनता यह अंतर अब भली-भांति समझने लगी है।
कांग्रेस का भविष्य अब चुनावी रणनीतियों से नहीं, आत्मबोध से तय होगा। यदि वह अपने अहंकार का त्याग करे। विवेक को पुनः स्थान दे और राष्ट्र को स्वयं से ऊपर रखे तो पुनरुत्थान संभव है। अन्यथा इतिहास में उसका स्थान एक चेतावनी के रूप में दर्ज होगा।
यह प्रश्न बार-बार उठता है कि यदि एक बड़ा राष्ट्रीय दल कमजोर होता है तो क्या लोकतंत्र भी कमजोर हो जाता है? उत्तर सीधा नहीं है। लोकतंत्र किसी एक दल पर निर्भर नहीं होता है। वह संस्थाओं, चेतना और नागरिक विवेक पर टिका होता है। यदि लोकतंत्र किसी एक दल के सहारे खड़ा हो, तो वह पहले से ही अस्वस्थ है। इस दृष्टि से देखें तो कांग्रेस का पतन लोकतंत्र की विफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परीक्षा है।
लोकतंत्र में विपक्ष का काम केवल सरकार का विरोध करना नहीं होता है। विपक्ष सत्ता को संतुलित करता है। नीतियों पर प्रश्न उठाता है और विकल्प प्रस्तुत करता है। लेकिन जब विपक्ष केवल नकारात्मकता तक सीमित हो जाए। हर निर्णय को षड्यंत्र कहे और स्वयं कोई स्पष्ट मार्ग न दे तो वह लोकतंत्र का भार नहीं, बाधा बन जाता है। कांग्रेस का संकट यहीं सबसे स्पष्ट दिखाई देता है।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार पवित्र है, लेकिन विरोध की भी एक मर्यादा होती है। जब विरोध राष्ट्रहित से टकराने लगे, राष्ट्रीय संस्थाओं की साख पर चोट करे और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आंतरिक राजनीति का प्रदर्शन बने, तो वह विरोध नहीं, राजनीतिक आत्मघात बन जाता है। जनता इस अंतर को समझती है और जब समझ जाती है तो वह चुपचाप निर्णय भी ले लेती है।
यह आशंका भी अक्सर व्यक्त की जाती है कि कांग्रेस के कमजोर होने से एक-दलीय प्रभुत्व स्थापित हो जाएगा। लेकिन इतिहास बताता है कि यदि सत्ता में बैठा दल विवेक से हटेगा तो जनता विकल्प गढ़ लेगी। भारत की जनता अब राजनीतिक रूप से परिपक्व है। वह स्थायी नायक नहीं मानती है। स्थायी शत्रु भी नहीं बनाती है और हर चुनाव को नए सिरे से तौलती है, इसलिए खतरा एक-दलीय प्रभुत्व का नहीं है बल्कि विपक्ष के वैचारिक शून्य का है।
आज भारत एक नई राजनीति की मांग कर रहा है जो केवल विरोध नहीं, समाधान दे। जो पहचान की राजनीति से ऊपर उठे। जो संस्कृति और आधुनिकता को जोड़ सके और जो राष्ट्र को वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ रखे। यदि कांग्रेस इस मांग को समझ पाती है तो वह पुनः प्रासंगिक हो सकती है। अन्यथा नए दल, नए चेहरे और नई विचारधाराएँ उस स्थान को भर देंगी।
लोकतंत्र का भविष्य किसी दल या नेता के हाथ में नहीं होता है। वह होता है जागरूक नागरिक के हाथ में। प्रश्न करने वाले मतदाता के हाथ में और विवेकपूर्ण निर्णय के हाथ में। जब तक नागरिक भावनाओं से नहीं, विवेक से मतदान करेगा, तब तक लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा।
कांग्रेस का पतन भारत के लिए शोक नहीं, चिंतन का अवसर है। यह अवसर बताता है कि लोकतंत्र स्थिर नहीं होता है बल्कि राजनीति को निरंतर आत्मशुद्धि की आवश्यकता होती है और कोई भी दल स्वयं को इतिहास से बड़ा नहीं मान सकता है।
किसी राष्ट्र की पहचान उसकी संस्कृति से होती है, न कि उसके तमाशे से। संस्कृति मर्यादा सिखाती है। संयम सिखाती है और आत्मगौरव सिखाती है। जब राजनीति संस्कृति को छोड़कर तमाशे का रास्ता चुन ले, तो वह क्षणिक तालियाँ और स्थायी अविश्वास कमाती है। भारत की आत्मा कभी भी प्रदर्शनप्रिय नहीं रही है। वह गरिमा और गहराई में विश्वास करती है।
आज का भारत युवा है। वह प्रश्न करता है, तर्क चाहता है और भावुक नारों से जल्दी प्रभावित नहीं होता है। वह राजनीति में ईमानदारी देखना चाहता है, स्पष्ट दृष्टि चाहता है और राष्ट्र के लिए दीर्घकालिक योजना चाहता है। जो दल युवाओं को केवल “भीड़” समझते हैं, वे भविष्य से हाथ धो बैठते हैं। कांग्रेस की सबसे बड़ी विफलता यहीं स्पष्ट होती है कि वह युवा भारत की भाषा समझ ही नहीं पाई।
लोकतंत्र में अंतिम निर्णय नेताओं का नहीं होता है । वह होता है उस किसान का, उस मजदूर का, उस युवा का और उस नागरिक का, जो हर पाँच वर्ष में चुपचाप मतदान करता है। जनता लंबे समय तक भ्रमित हो सकती है लेकिन स्थायी रूप से नहीं। जब उसे लग जाता है कि “यह दल हमारे आत्मसम्मान से कट गया है” तो वह बिना शोर किए अपना निर्णय बदल देती है।
कांग्रेस का पतन भारत के लिए केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है। यह है सत्ता के अहंकार पर चेतावनी , परिवारवाद पर प्रश्न है और विवेक के मौन पर कठोर टिप्पणी।
