एक अंतहीन द्वंद्व है - राजनीति, जनमानस और पत्रकार की निरपेक्षता

Jitendra Kumar Sinha
0



राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं है, वह भावनाओं, आकांक्षाओं और विचारों का महासागर है। यह ऐसी दुनिया है जिसमें लोगों का जुड़ाव स्वतः हो जाता है, चाहे वह किसी भी नेता या विचारधारा से क्यों न हो। किसी के लिए नरेन्द्र मोदी आशा का प्रतीक है, किसी के लिए राहुल गांधी संघर्ष का नाम हैं, किसी के लिए लालू प्रसाद सामाजिक न्याय का प्रतीक हैं, तो किसी के लिए ममता बनर्जी प्रतिरोध की आवाज।

जब उनका नेता जीतता है तो मानो स्वयं की विजय हो जाती है और जब वह पराजित होता है तो ऐसा लगता है जैसे अपनी हार हो गई हो। यह जुड़ाव उस नदी की धारा की तरह है जिसमें लोग अनायास बहने लगते हैं, कभी उत्साह में, कभी क्रोध में, कभी गर्व में, तो कभी आक्रोश में।

लेकिन सबसे बड़ी पीड़ा तब होती है जब  सत्य को असत्य और असत्य को सत्य मान लेते हैं। जब बिना विचार किए, बिना परीक्षण किए किसी विचारधारा में कूद पड़ते हैं और फिर उसी के परिणामों का ‘अन्नप्राशन’ करते हैं। यह प्रवृत्ति केवल राजनीति की नहीं, बल्कि मानवीय जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है।

राजनीति केवल नीतियों और घोषणाओं का खेल नहीं है, यह पहचान (Identity) का प्रश्न भी है। लोग अपने राजनीतिक नेताओं में स्वयं को देखने लगते हैं। जातीय पहचान, धार्मिक पहचान, क्षेत्रीय अस्मिता, आर्थिक वर्ग और सांस्कृतिक गौरव, इन सबका संगम राजनीतिक जुड़ाव को जन्म देता है।

परिवार और परिवेश से प्राप्त विचारधारा, सामाजिक अनुभव और व्यक्तिगत संघर्ष, मीडिया और सोशल मीडिया का प्रभाव, नेताओं की छवि निर्माण रणनीति, यह सब राजनीतिक जुड़ाव धीरे-धीरे ‘समर्थन’ से ‘समर्पण’ में बदल जाता है। और जब समर्थन अंध-समर्थन में बदलता है, तब तर्क पीछे छूट जाता है।

राजनीतिक समर्थक अपने नेता की जीत को व्यक्तिगत उपलब्धि मानते हैं। सोशल मीडिया पर जश्न मनाते हैं, सड़कों पर रैलियाँ निकालते हैं, पटाखे फोड़ते हैं और मिठाइयाँ बांटते हैं, लेकिन हार की स्थिति में वही समर्थक गहरे अवसाद में चले जाते हैं। व्यक्ति अपनी अस्मिता को नेता से जोड़ लेता है। राजनीतिक दल ‘हम’ और ‘वे’ की भावना को मजबूत करते हैं। विरोधी दल को ‘शत्रु’ की तरह प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रकार राजनीति सामाजिक विमर्श से हटकर ‘भावनात्मक युद्ध’ बन जाती है।

सबसे खतरनाक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। आज सूचना का युग है और यही सूचना कभी-कभी भ्रम का जाल भी बन जाती है। आधी-अधूरी जानकारी, संपादित वीडियो क्लिप, भावनात्मक पोस्ट और सांप्रदायिक उकसावे का भ्रामक सूचना लोग बिना सत्यापन किए इस सूचनाओं को साझा कर देते हैं और धीरे-धीरे झूठ, बार-बार दोहराए जाने पर ‘सत्य’ जैसा प्रतीत होने लगता है।

पत्रकारिता का मूल धर्म है निरपेक्षता। लेकिन जब समाज स्वयं विभाजित हो जाए, तब पत्रकार की निष्पक्षता भी कटघरे में खड़ी कर दी जाती है। यदि वह सत्ता की आलोचना करे तो ‘विरोधी’ कहलाता है। यदि वह विपक्ष की आलोचना करे तो ‘भक्त’ कह दिया जाता है। सोशल मीडिया ट्रोलिंग, व्यक्तिगत हमले, संस्थागत दबाव, विज्ञापन और आर्थिक दबाव, निरपेक्षता अब आदर्श से अधिक संघर्ष का नाम बन गई है।

कभी पत्रकारिता ‘चौथा स्तंभ’ कही जाती थी। आज उस स्तंभ की मजबूती पर प्रश्न उठते हैं। इसका कारण है कॉर्पोरेट स्वामित्व, राजनीतिक गठजोड़, टीआरपी की होड़ और सनसनीखेज बहसों का प्रचलन। वास्तविक मुद्दे, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, ग्रामीण विकास, अक्सर शोर में दब जाते हैं।

सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को ‘पत्रकार’ बना दिया है। यह लोकतंत्र के लिए वरदान भी है और अभिशाप भी। इसका सकारात्मक पहलू है त्वरित सूचना, आम जनता की आवाज और जनांदोलन को बल। लेकिन इसका नकारात्मक पहलू है अफवाहों की बाढ़, ट्रोल संस्कृति और ध्रुवीकरण। लोग ‘एल्गोरिद्म’ के अनुसार, वही देखते हैं जो उनकी सोच से मेल खाता है। इससे विचारों का दायरा संकुचित होता जाता है।

राजनीति जब विचारधारात्मक संघर्ष में बदलती है तो समाज दो ध्रुवों में बंट जाता है। राष्ट्रवाद बनाम उदारवाद, परंपरा बनाम आधुनिकता और धर्मनिरपेक्षता बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। यह विभाजन केवल संसद तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि यह परिवारों, मित्रताओं और सामाजिक रिश्तों में भी प्रवेश कर जाता है।

एक पत्रकार रोज ऐसे प्रकरणों से गुजरता है जहाँ उसे तथ्य प्रस्तुत करने होते हैं, बिना भावनाओं के, बिना पक्षपात के। परंतु वह भी मनुष्य है। उसके अपने विचार, अपने अनुभव, अपनी धारणाएँ होती हैं। वह सोंचता है कि क्या मैं पूरी तरह निष्पक्ष हूँ? क्या मेरी भाषा में छिपा पूर्वाग्रह झलक रहा है? क्या मैं अनजाने में किसी विचारधारा का समर्थन कर रहा हूँ? निरपेक्षता केवल पेशेवर दायित्व नहीं, आत्मसंयम का अभ्यास है।

लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है। क्योंकि प्रश्न पूछना, जवाबदेही सुनिश्चित करना और तथ्यों की जांच करना, यह सब नागरिक की जिम्मेदारी है। यदि जनता भावनाओं में बहकर निर्णय लेगी, तो लोकतंत्र कमजोर होगा। आज सबसे बड़ी आवश्यकता है, संवाद। मतभेद लोकतंत्र का सौंदर्य हैं। लेकिन मनभेद लोकतंत्र की कमजोरी। यदि असहमति को शत्रुता में बदल देंगे, तो समाज में स्थायी दरारें पड़ेंगी।

राजनीति में नैतिकता की चर्चा अक्सर आदर्शवाद लगती है, लेकिन बिना नैतिक आधार के सत्ता तानाशाही में बदल सकती है। पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान, लोकतंत्र के आधारस्तंभ हैं। जब किसी नेता के हर कथन का समर्थन करते हैं, तब क्या स्वतंत्र विचारक हैं? जब विरोधी के हर कथन को खारिज करते हैं, तब क्या  न्यायप्रिय हैं? यह प्रश्न सबको स्वयं से पूछना चाहिए। भविष्य की पत्रकारिता को चाहिए तथ्यपरकता, डिजिटल साक्षरता, नैतिक प्रशिक्षण और स्वतंत्र वित्तीय मॉडल। पत्रकार को केवल सूचना वाहक नहीं, बल्कि विवेक का प्रहरी बनना होगा।

जीवन चलता रहा है, चलता है और चलता रहेगा। राजनीति भी चलती रहेगी। विचारधाराएँ आएँगी, जाएँगी। नेता बदलेंगे। लेकिन समाज की आत्मा तभी सुरक्षित रहेगी जब हम सत्य और असत्य के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित करेंगे। एक पत्रकार के रूप में निरपेक्षता कटघरे में खड़ी होकर चाहे मुंह चिढ़ाए, परंतु वही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि हम तर्क, संवाद और सत्य को अपना पथप्रदर्शक बनाए रखेंगे, तो राजनीति विभाजन का नहीं, विकास का माध्यम बन सकती है।



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top