राजनीति से परे है - डिजिटल युग की चमक

Jitendra Kumar Sinha
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राजनीति हमारे समय की सबसे ऊँची आवाज बन चुकी है। टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया की टाइमलाइन तक, हर जगह सत्ता, विरोध, आरोप और प्रत्यारोप का शोर है। लेकिन इस शोर के परे भी एक ऐसी दुनिया है, जो चुपचाप टूट रही है, बिखर रही है और दम तोड़ रही है। यह दुनिया घर के भीतर, मन के भीतर, और बच्चों की आँखों के भीतर बसती है। आधुनिकता का दावा हमेशा प्रगति के नाम पर किया जाता है। कहा जाता है कि तकनीक आगे ले जा रही है, तेज, सक्षम और वैश्विक बना रही है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यह आधुनिकता अक्सर प्राचीनता की आहुति लेकर आती है। वह परंपराएँ, रिश्ते, संवाद और संवेदनाएँ जो सदियों में गढ़ी गई थीं, वे कुछ दशकों की डिजिटल क्रांति में हाशिए पर धकेल दी गईं हैं।

सभ्यता का इतिहास केवल औजारों के विकास का इतिहास नहीं है। यह संवेदनाओं, सामूहिकता और संवाद का भी इतिहास है। जब मनुष्य ने आग जलाई, तो वह केवल गर्मी के लिए नहीं थी, वह कथा कहने का केंद्र था। जब गाँव बना, तो वह केवल आवास नहीं था बल्कि वह रिश्तों का प्रयोगशाला था। आधुनिक तकनीक ने सुविधा दी, लेकिन उसने मूल पूँजी छीन ली। आमने-सामने बैठकर बात करने का धैर्य, मौन में भी साथ होने की कला, प्रतीक्षा करने की क्षमता और दुख को साझा करने का साहस। तेज हुए लेकिन गहरे नहीं रहे। जुड़े, लेकिन निकट नहीं रहे।

आज मोबाइल फोन उतना ही अनिवार्य हो गया है जितनी साँसें। सुबह आँख खुलने से लेकर रात आँख बंद होने तक अलार्म मोबाइल का, समाचार मोबाइल का, संवाद मोबाइल का, मनोरंजन मोबाइल का और यहाँ तक कि नींद भी मोबाइल के भरोसे ही गया है। लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि मोबाइल आवश्यक है या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या मोबाइल हाथ में है, या मोबाइल के हाथ में हैं?

फ्लोरोक्विनोलोन जैसी दवाइयों के दुष्प्रभाव चिकित्सा विज्ञान में कुख्यात हैं। लेकिन मोबाइल के दुष्प्रभाव उससे भी अधिक सूक्ष्म, व्यापक और दीर्घकालिक हैं, ध्यान की अवधि कम होना, चिड़चिड़ापन, आक्रामकता, भावनात्मक सुन्नता, रिश्तों से कटाव और आत्मकेन्द्रित व्यवहार। सबसे खतरनाक प्रभाव है सहनशीलता का क्षरण।

मोबाइल और सोशल मीडिया ने तुरंत प्रतिक्रिया का आदी बना दिया है। पसंद नहीं आया तो अनफॉलो, असहमति हुई तो ब्लॉक, विरोध दिखा तो ट्रोल और धीरे-धीरे यह भूलते चले गए कि असहमति भी संवाद का ही एक रूप होती है। अब बात नहीं करते हैं, बल्कि प्रतिक्रिया देते हैं। सुनते नहीं हैं  बल्कि जवाब देते हैं।

संस्कृति केवल त्योहारों और परिधानों का नाम नहीं है। संस्कृति है बड़ों की बात धैर्य से सुनना। बच्चों की जिज्ञासा को समय देना। पड़ोसी का हाल पूछना और दुःख में बिना बुलाए पहुँच जाना। लेकिन डिजिटल युग ने लोक से काट दिया है और अब रिश्ते “स्टेटस” बन गया है। भावनाएँ “इमोजी”  और संवेदना “रिएक्शन”।

दिन भर सैकड़ों लोगों से “कनेक्ट” रहते हैं, लेकिन रात को अकेलेपन से घिरे होते हैं। यह है आभासी जुड़ाव का धोखा। हजारों फॉलोअर्स, लेकिन एक ऐसा कंधा नहीं जिस पर सिर रख सके। सैकड़ों चैट लेकिन एक गहरी बातचीत नहीं। 

रील्स ने मस्तिष्क को डोपामिन का गुलाम बना दिया है। तेज दृश्य, तीव्र संगीत, अधूरी कहानियाँ लेकिन इसका परिणाम है लंबा ध्यान असंभव, किताब पढ़ना उबाऊ और मौन असहनीय। गेम अब केवल खेल नहीं रहा। वह वैकल्पिक जीवन बन चुका हैं जहाँ हार का दर्द नहीं। असफलता का कलंक नहीं,वास्तविक जिम्मेदारियाँ नहीं लेकिन वास्तविक जीवन से भागकर बनाया गया हर आभासी संसार आखिरकार और गहरी खालीपन छोड़ता है।

किशोरावस्था,संवेदनशील होती है, जिज्ञासु होती है और अकेली भी होती है। डिजिटल दुनिया ने इसी अकेलेपन को निशाना बनाया है लाइक यानि स्वीकृति, व्यू यानि महत्व और फॉलो यानि पहचान और जब यह सब नहीं मिलता है तो अवसाद, आत्मग्लानि और कभी-कभी आत्मघात होता है। 

एल्गोरिदम वह नहीं दिखाता है जो सत्य है, बल्कि वह दिखाता है जो बाँध सके, डर, लालच, उत्तेजन और तुलना। यह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध है और बिना जाने इसके मोहरे लोग बन चुके हैं।

आज परिवार साथ रहते हुए भी अलग-अलग दुनिया में हैं। बच्चा गेम में, युवा रील में और बुजुर्ग अकेले। संवाद टूट चुका है और जहाँ संवाद टूटता है, वहाँ समाज टूटता है। आभासी रोमांच की तलाश में पढ़ाई छूट रही है। करियर भटक रहा है और स्वास्थ्य गिर रहा है। वर्तमान के छोटे सुख के लिए भविष्य की बड़ी संभावनाएँ गिरवी रख रहे हैं।

तकनीक दोषी नहीं है। दोषी है अंधा उपभोग, अनुशासनहीन उपयोग,  सुविधा-लोलुपता। चाकू से भोजन भी बनता है और हत्या भी। यह सब निर्भर करता है कि इसका कैसे उपयोग करते हैं। समाधान पीछे लौटना नहीं, संतुलन बनाना है। मोबाइल को औजार बनाइए, मालिक नहीं। इंटरनेट को साधन रखना चाहिए, साध्य नहीं। बच्चों को समय देना चाहिए, सिर्फ डिवाइस नहीं। 

यह काल तकनीक-विरोध का नहीं है। यह तकनीक-बोध का काल है। यदि समय रहते संवाद नहीं लौटा, संवेदना नहीं बची  और सीमाएँ नहीं बनी तो आने वाली पीढ़ियाँ हाई-स्पीड इंटरनेट पर लो-इमोशन इंसान बन जायेगा।



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