महाशिवरात्रि - शिवत्व के बारह अनंत प्रकाश - काल भी शिव के चरणों में ठहर जाता है

Jitendra Kumar Sinha
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महाशिवरात्रि आत्मा और परमात्मा के मिलन का महोत्सव है। यह वह रात्रि है जब साधना, तप, ध्यान और भक्ति अपने चरम पर पहुँचते हैं। शास्त्रों के अनुसार, इसी रात्रि भगवान शिव ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए थे। ज्योतिर्लिंग अर्थात वह लिंग जहाँ शिव स्वयं प्रकाश के रूप में विराजमान हैं। भारत भूमि पर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र हैं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक एकता के सजीव प्रतीक भी हैं।

भारतीय सनातन परंपरा में यदि कोई पर्व आत्मा को भीतर तक झकझोर देता है, तो वह है महाशिवरात्रि। यह केवल उपवास या जागरण नहीं है बल्कि यह चेतना का पर्व है। यह वह रात्रि है जब शिव तांडव में नहीं, बल्कि पूर्ण स्थिरता में होते हैं। जब वे संहारक नहीं, साक्षी बनते हैं। जब वे देव नहीं, बल्कि स्वयं ब्रह्म बनकर प्रकट होते हैं। महाशिवरात्रि को लेकर शास्त्रों में अनेक मत हैं। कहीं इसे शिव-पार्वती विवाह की रात्रि कहा गया है। कहीं समुद्र मंथन के विषपान की। तो कहीं ज्योतिर्लिंग प्राकट्य की। लेकिन इन सभी कथाओं के केंद्र में एक ही तत्व है “शिव का अनंत प्रकाश”। यही प्रकाश ज्योतिर्लिंग के रूप में भारत की धरती पर प्रकट हुआ है।

भारत में शिव को केवल एक देवता मान लेना, शिव के साथ अन्याय है। शिव किसी संप्रदाय की सीमा में नहीं बंधते हैं, किसी कर्मकांड में सीमित नहीं होते हैं और किसी मूर्ति में कैद नहीं किए जा सकते हैं। शिव देव नहीं बल्कि दृष्टि हैं। वे विचार हैं, वे मौन हैं, वे प्रश्न हैं और वे उत्तर भी। महाशिवरात्रि इसी दृष्टि का उत्सव है। यह वह रात्रि है जब भारत केवल शिव की पूजा नहीं करता है, बल्कि शिव की तरह सोचने का प्रयास करता है- निर्लिप्त, निर्भय और निर्विकार।

सामान्य अर्थों में शिवरात्रि को ‘रात्रि’ का पर्व कहा जाता है, किंतु यह अंधकार का उत्सव नहीं है। यह उस अज्ञान का स्वीकार है, जिससे गुजरकर ही ज्ञान संभव है। शिव अंधकार से भागते नहीं हैं वे उसमें ध्यान लगाते हैं। आज का समाज उजाले से डरने लगा है। उसे हर प्रश्न से भय है, हर मौन से असहजता है। ऐसे समय में महाशिवरात्रि स्मरण कराती है कि हर उत्तर से पहले प्रश्न आवश्यक है, और हर सृजन से पहले शून्य।

ज्योतिर्लिंगों को यदि केवल तीर्थस्थल मान लिया जाए, तो उनके साथ भी अन्याय करते हैं। ज्योतिर्लिंग सत्ता के प्रतीक नहीं हैं बल्कि वे साक्ष्य हैं। इस बात के साक्ष्य हैं कि भारत ने ईश्वर को सिंहासन पर नहीं, प्रकाश में देखा है। आज जब धर्म को शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम बनाया जा रहा है, तो ज्योतिर्लिंग याद दिलाता है कि शिव ने कभी साम्राज्य नहीं माँगा बल्कि उन्होंने केवल चेतना माँगी।

समकालीन समय में धर्म सुविधावादी हो चला है। कम समय में अधिक फल। कम साधना में अधिक वरदान और कम त्याग में अधिक पुण्य। शिव इस प्रवृत्ति के ठीक उलट हैं। वे तप में रहते हैं, श्मशान में बैठते हैं, भस्म धारण करते हैं। शिव बताते हैं कि सुविधा नहीं, सत्य ही मुक्ति का मार्ग है। महाशिवरात्रि इसी असुविधाजनक सत्य को स्वीकार करने की रात है।

भारत को समझने के लिए शिव को समझना आवश्यक है, और शिव को समझने के लिए भारत को। भारत भी शिव की तरह विरोधाभासों से भरा है यहाँ त्याग भी है, वैभव भी। यहाँ श्मशान भी हैं, स्वर्ण मंदिर भी। यहाँ मौन साधु भी हैं, और वाचाल बाजार भी। शिव इन सबको स्वीकार करते हैं और भारत भी।

काशी मृत्यु का उत्सव है, केदार जीवन का तप। उज्जैन समय को साधता है, रामेश्वरम समर्पण सिखाता है। ये ज्योतिर्लिंग केवल स्थल नहीं है बल्कि दर्शन-क्रम हैं। यह बताता है कि जीवन को समझने के लिए मनुष्य को हर दिशा में चलना होगा। आज जब देश विचारधाराओं में बँटता जा रहा है, जबकि ज्योतिर्लिंग जोड़ते हैं एक अदृश्य धागा से।

आधुनिक विमर्श में ‘लिंग’ शब्द को लेकर अनेक भ्रांतियाँ फैलाई गईं, किंतु शास्त्र स्पष्ट हैं कि लिंग कोई भौतिक आकृति नहीं है, बल्कि ‘लय’ और ‘लीनता’ का चिह्न है।शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार, ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। तभी एक अनंत अग्नि-स्तंभ प्रकट हुआ, न उसका आदि था, न अंत। ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर गए, विष्णु वराह बनकर नीचे, लेकिन दोनों असफल रहे। तभी उस स्तंभ से शिव प्रकट हुए और कहा कि “जो मुझे सीमित करना चाहता है, वह मुझे नहीं जान सकता।” यही अनंत स्तंभ है ज्योतिर्लिंग। जहाँ शिव किसी मूर्ति में नहीं, प्रकाश में विराजते हैं।

भारत में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग केवल तीर्थ नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक भूगोल रचता है। यह उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम को जोड़ता है और भारत को एक अदृश्य शिव-सूत्र में बाँधता है।

सोमनाथ (गुजरात) शिव का पहला ज्योतिर्लिंग है। यहाँ चंद्रदेव ने अपने क्षय रोग से मुक्ति पाई थी। शिव ने उन्हें अमर नहीं किया, लेकिन क्षय और वृद्धि का चक्र दिया। यही चंद्रमा का शुक्ल और कृष्ण पक्ष है। इतिहास में सोमनाथ पर असंख्य आक्रमण हुए, मंदिर तोड़ा गया, लेकिन आस्था नहीं टूटी। सोमनाथ सिखाता है संहार के बाद भी पुनर्निर्माण ही शिव का मार्ग है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (आंध्र प्रदेश) श्रीशैल पर्वत पर स्थित शिव और पार्वती के उस प्रेम का प्रतीक है, जहाँ वे पुत्र कार्तिकेय को मनाने स्वयं पर्वत पर आए। यह शिव का पारिवारिक रूप है जहाँ वे संन्यासी नहीं, पिता हैं।

महाकालेश्वर (उज्जैन) एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहाँ शिव काल को नियंत्रित करते हैं। भस्म आरती केवल पूजा नहीं है बल्कि यह मृत्यु का स्मरण है। यह कहती है कि जो नश्वर है, वही सत्य है। उज्जैन, जहाँ समय स्वयं शिव के चरणों में नतमस्तक है।

ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश) नर्मदा नदी के मध्य स्थित ज्योतिर्लिंग ‘ॐ’ के आकार का है। यह बताता है कि शिव और शक्ति अलग नहीं हैं वे एक ही चेतना के दो स्वर हैं।

केदारनाथ (उत्तराखंड) हिमालय की गोद में स्थित है जहाँ पांडव अपने पापों का प्रायश्चित करने आए थे। यह शिव का वह रूप है जहाँ वे मौन हैं, परंतु करुणा से भरे हैं।

भीमाशंकर (महाराष्ट्र) त्रिपुरासुर वध के पश्चात यहाँ शिव प्रकट हुए। यह ज्योतिर्लिंग बताता है रौद्रता भी अंततः रक्षा में बदलती है।

काशी विश्वनाथ (वाराणसी) काशी शिव की नगरी है। मान्यता है कि यहाँ मृत्यु मोक्ष देती है क्योंकि स्वयं शिव कान में तारक मंत्र कहते हैं। यहाँ शिव राजा नहीं हैं बल्कि सखा हैं।

त्र्यंबकेश्वर (नासिक) यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास है। गोदावरी नदी का उद्गम यही है ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की धारा।

वैद्यनाथ (देवघर) रावण की कथा से जुड़ा यह ज्योतिर्लिंग बताता है कि अहंकार भक्ति के आगे टिक नहीं पाता है ।

नागेश्वर (गुजरात) नागों से रक्षा का प्रतीक यह ज्योतिर्लिंग भयमुक्त जीवन का संदेश देता है।

रामेश्वरम (तमिलनाडु) यहाँ राम स्वयं शिव के उपासक हैं। यह ज्योतिर्लिंग बताता है कि भक्ति में कोई ऊँच-नीच नहीं है।

घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र) एक साधारण स्त्री की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए। यह बताता है कि शिव को आडंबर नहीं, समर्पण चाहिए।

महाशिवरात्रि की रात को उपवास शरीर को शुद्ध करता है, जागरण चेतना को और मंत्र आत्मा को। शिवरात्रि वह क्षण है जब मनुष्य भीतर के अंधकार से बाहर निकलता है। द्वादश ज्योतिर्लिंग भारत की आध्यात्मिक एकता का जीवंत प्रमाण हैं। भाषा अलग, पर भाव एक है “शिव”।

शिव श्मशान में भी हैं और कैलास पर भी। वे भस्म में भी हैं और सौंदर्य में भी। महाशिवरात्रि सिखाती है नाश में भी नवसृजन है। “न मृत्यु है, न जन्म जो है, वही शिव है।”

शिव बिना शक्ति अधूरा है। अर्धनारीश्वर की अवधारणा केवल प्रतीक नहीं है, यह सामाजिक दर्शन है। आज जब समाज स्त्री को या तो देवी बना रहा है या वस्तु, शिव याद दिलाते हैं कि स्त्री शक्ति है, पूरक है, बराबर है। महाशिवरात्रि केवल शिव की नहीं बल्कि शक्ति की भी रात्रि है।

महाशिवरात्रि केवल व्रत, बेलपत्र और जलाभिषेक तक सीमित रह जाए, तो यह पर्व अधूरा है। इसका वास्तविक अर्थ है अहंकार का विसर्जन। मौन का अभ्यास और सत्य से साक्षात्कार। शिव बाहर नहीं भीतर हैं।

महाशिवरात्रि याद दिलाती है कि सभ्यताएँ बचाने के लिए हथियार नहीं, चेतना चाहिए और चेतना का नाम “शिव” है।

‘ज्योति’ का अर्थ है प्रकाश और ‘लिंग’ का अर्थ है चिह्न। ज्योतिर्लिंग वह दिव्य चिह्न है जिसमें शिव अनंत प्रकाश स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। शिवपुराण और लिंगपुराण में ज्योतिर्लिंगों की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इन स्थलों पर शिव स्वयंभू हैं अर्थात किसी ने उनकी स्थापना नहीं की, वे स्वयं प्रकट हुए।

मान्यता है कि महाशिवरात्रि की रात्रि इन ज्योतिर्लिंगों में विशेष ऊर्जा का संचार होता है। इस रात्रि उपवास, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप और जागरण करने से व्यक्ति जन्म-जन्मांतर के बंधनों से मुक्त होता है। यह रात्रि शिव और शक्ति के तांत्रिक संतुलन का भी प्रतीक है।

कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से असम तक शिव विभिन्न रूपों में पूजे जाते हैं, लेकिन भाव एक ही है। ज्योतिर्लिंग भारत की सांस्कृतिक अखंडता और आध्यात्मिक राष्ट्रबोध को सुदृढ़ करते हैं।

महाशिवरात्रि स्मरण कराती है कि शिव केवल संहारक नहीं हैं, बल्कि सृजन और करुणा के भी स्रोत हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग उस अनंत चेतना के बारह द्वार हैं, जहाँ से मनुष्य आत्मबोध की यात्रा पर निकलता है। “न शिव जन्मते हैं, न मरते हैं। वे तो केवल प्रकाशित होते हैं।”



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