बिहार सरकार किसानों तक पहुँचाएगी उनकी अपनी भाषा में खेती की जानकारी

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार में कृषि क्षेत्र को तकनीक और स्थानीय भाषाओं से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की जा रही है। अब राज्य के किसानों को खेती से जुड़ी जानकारियां केवल हिन्दी और अंग्रेजी तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि उन्हें उनकी मातृभाषा में भी कृषि संबंधी सलाह और जानकारी उपलब्ध होगी। सरकार ने फैसला किया है कि बिहार कृषि एप के माध्यम से किसानों को मगही, भोजपुरी, अंगिका और बज्जिका जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में भी खेती के गुर सिखाए जाएंगे। इस पहल का उद्देश्य किसानों तक सरल और सहज भाषा में कृषि जानकारी पहुंचाकर उन्हें तकनीक से जोड़ना और खेती को अधिक लाभकारी बनाना है।


शुक्रवार को पटना के मीठापुर स्थित कृषि भवन में कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने विभागीय अधिकारियों के साथ बिहार कृषि एप की समीक्षा बैठक की। इस दौरान उन्होंने एप की वर्तमान स्थिति, उसके उपयोग और भविष्य की योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की। कृषि मंत्री ने कहा कि डिजिटल क्रांति के इस दौर में बिहार के किसानों को आधुनिक तकनीक से जोड़ना बेहद आवश्यक है। यदि किसान समय पर सही जानकारी प्राप्त करेंगे तो उनकी उत्पादकता बढ़ेगी और कृषि क्षेत्र अधिक मजबूत होगा।


भारत में कृषि से जुड़ी अधिकांश योजनाएं और तकनीकी जानकारी अक्सर हिंदी या अंग्रेजी में उपलब्ध रहती हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसे किसान हैं जो स्थानीय बोलियों में संवाद करना अधिक सहज समझते हैं। बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग भाषाई संस्कृति मौजूद है। मगध क्षेत्र में मगही, पश्चिम और उत्तर बिहार के हिस्सों में भोजपुरी, मिथिला के आसपास बज्जिका और पूर्वी क्षेत्रों में अंगिका का व्यापक उपयोग होता है। ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे तकनीकी जानकारी को पूरी तरह समझ नहीं पाते। सरकार की यह नई योजना इस समस्या का समाधान करने की कोशिश है। जब किसान अपनी भाषा में जानकारी सुनेंगे या पढ़ेंगे, तो वे उसे अधिक आसानी से समझ सकेंगे।


बिहार कृषि एप किसानों के लिए एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जहां खेती से संबंधित विभिन्न प्रकार की जानकारियां उपलब्ध कराई जाती हैं। इसके माध्यम से किसानों को फसल प्रबंधन, मौसम, बीज, उर्वरक, सरकारी योजनाओं और कृषि तकनीकों की जानकारी दी जाती है। कृषि मंत्री के अनुसार वर्तमान में लगभग 11.50 लाख किसान इस एप पर पंजीकृत हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकार ने इस वर्ष के अंत तक करीब 80 लाख किसानों को इस प्लेटफॉर्म से जोड़ने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। यदि यह लक्ष्य पूरा होता है, तो बिहार देश के उन राज्यों में शामिल हो सकता है जहां कृषि क्षेत्र में डिजिटल भागीदारी बड़े स्तर पर दिखाई देगी।


कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसानों को कई लाभ मिल सकते हैं। सबसे पहले उन्हें समय पर जानकारी प्राप्त होगी। इसके अलावा खेती में होने वाली समस्याओं का समाधान भी तेजी से मिल सकेगा। इससे किसानों को यह जानने में मदद मिलेगी कि कौन-सी फसल कब बोनी है, किस बीमारी से फसल प्रभावित हो सकती है और उसका उपचार क्या होगा। साथ ही मौसम की जानकारी मिलने से किसान पहले से तैयारी भी कर सकेंगे। स्थानीय भाषाओं में सामग्री उपलब्ध होने से बुजुर्ग किसान भी इस तकनीक का उपयोग करने में सहज महसूस करेंगे।


आज कृषि केवल पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं रह गई है। बदलते समय में किसानों को नई तकनीकों, आधुनिक उपकरणों और डिजिटल माध्यमों का उपयोग सीखना होगा। सरकार की यह पहल इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम मानी जा रही है। हालांकि केवल एप बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि गांव-गांव तक इसकी जानकारी पहुंचाना और किसानों को इसके उपयोग के लिए प्रशिक्षित करना भी जरूरी होगा। यदि जागरूकता और प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो यह योजना बिहार के कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है।


भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समझ और विश्वास का आधार भी होती है। जब किसान अपनी बोली में खेती की जानकारी प्राप्त करेंगे, तो उनके भीतर तकनीक के प्रति भरोसा बढ़ेगा। बिहार सरकार की यह पहल न केवल किसानों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाएगी, बल्कि स्थानीय भाषाओं को भी सम्मान देने का काम करेगी। आने वाले समय में यह प्रयोग राज्य की कृषि व्यवस्था को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।



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